क्या धर्म कहता है कि, व्यक्ति को हर दिन नहाना चाहिए?
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आज के समय में लोगों ने धर्म को मजहब या संप्रदाय का पर्यायवाची मान लिया है। वे ‘धर्म’ शब्द सुनते ही किसी मत-पंथ या संप्रदाय से समझते हैं। यह एक बड़ी भूल है। इसी भूल के चलते धर्म की गरिमा संदिग्ध हो गई है और मनुष्य धार्मिक कहलाने में गर्व अनुभव करने के बदले संकोच अनुभव करता है। इस भ्रम को दूर करना जरूरी है।
वास्तव में ‘धर्म’ कोई संप्रदाय नहीं, कोई मत-पंथ नहीं, बल्कि वह एक ऐसी रीति-नीति है, जो मानव को महामानव बनाकर खड़ा करती है। वह धारण करने की वस्तु है, न कि रटने भर की। उसे धारण करने पर ही वह अपेक्षित अनुदान दे सकने में समर्थ होता है। केवल रटने भर के धर्म में कोई ताकत नहीं होती जो किसी को कुछ दे दे।
सृष्टि निर्माण में मानवी चेतना के प्रादुर्भाव के साथ ही कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य की भावना ने सामाजिक प्राणी मानव के समक्ष धर्म का स्वरूप प्रस्तुत कर दिया।
धर्म-भावना ईश्वरवादी सृष्टि से भी ऊंची है। संसार में कोई भी राष्ट्र, कोई भी प्राणी अधार्मिक होकर जी नहीं सकता। क्योंकि प्राणी मात्र के कल्याण के लिए जो कुछ भी संभव हो सकता है, वह सब धर्म की सीमाओं में रहकर ही हो सकता है। मनुष्य का धर्म यह है कि वह बाहरी व्यवहार और आन्तरिक वृत्तियों का परिशोधन करे, अपने मूल रूप को जीवन में व्यक्त करे।
यही शुद्ध स्वरूप ज्ञान ‘आत्मवत् सर्व भूतेषु’ की श्रेष्ठतम भावनाओं को स्फुरित कर लोकमंगल को सहज साध्य बना सकता है। स्थूल स्तर पर हम धर्म को दो रूपों में देख सकते हैं। एक रूप वह जो देश, काल, पात्र के अनुरूप आचार संहिता प्रस्तुत करता है और आवश्यकतानुसार यथोचित परिवर्तन के साथ लोकमंगल की दिशाएं सक्रिय बनाता है। धर्म का यह स्वरूप देश, काल और पात्र का सापेक्ष होता है।
हर दिन नहाना धर्म है?
दूसरा स्वरूप वह है जो मूल तत्त्व है, शाश्वत है, अजर, अमर, अपरिवर्तनीय व अविनाशी है। यह मानवी आध्यात्मिक शक्तियों का उस चरम बिन्दु तक का विकास है, जहां धरती पर स्वर्ग और मनुष्य में देवत्व का अवतरण हो जाता है। अर्थात् मानव का बाह्य आचरण एवं आंतरिक विचारणा मानव मात्र के कल्याण की दिशा में उन्मुख हो जाते हैं। धर्म का यह स्वरूप सार्वभौम, सार्वकालिक एवं सर्वजनीन होता है। यहीं आकर मानव ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की उदात्त भावना पर विहार करने लगता है।
वैसे समय एवं परिस्थिति के अनुसार भी धर्म की परिभाषा बदल जाती है। ऐसी अवस्था में सामने जो परिस्थिति होती है, उसी के अनुसार अर्थ व आचरण करने पड़ते हैं। उदाहरण स्वरूप जिस देश में जलाभाव हो, वहां सप्ताह में एक बार नहाना भी धार्मिक कृत्य हो सकता है, परन्तु जहां प्रकृति ने हर दिशा में जलराशि बिखरा रखी हो, वहां स्वास्थ्य संरक्षण व शारीरिक स्वच्छता के लिए प्रतिदिन स्नान करना धार्मिक कृत्य होगा। गरमी में जो वस्त्र काल-धर्म के प्रतीक होंगे, वे शीत ऋतु में नहीं। इसी प्रकार पात्रता के अनुसार धर्म-आचरण अपने आप में एक ही तथ्य है।
लेकिन दुर्भाग्य से मानव धर्म के मूल तत्त्व भी देश, काल, पात्र की संकुचित सीमाओं में बांधकर साम्प्रदायिक संकट का कारण बना दिये गये हैं। हमने विवेक को तिलाञ्जलि देकर मानव धर्म को मजहब एवं सम्प्रदाय के शिकंजे में फंसने दिया और अनिष्टकर स्थिति पैदा करते चले गये।