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इसलिए आज के युग में लोगों की उम्र कम होने लगी है
दलाई लामा / अध्यात्मिक गुरु
Updated Wed, 21 Jan 2015 02:48 PM IST
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हम ऐसे समय में रह रहे हैं जब क्रोध, भय और घृणा जैसी भावनाएं विश्व में विध्वंसकारी समस्याओं को जन्म दे रही है। इस दिशा में गंभीर चेतावनियां मिल रही है।
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प्रश्न यह है कि उन पर काबू पाने के लिए क्या कर सकते हैं? निस्संदेह ऐसी त्रस्त करने वाली भावनाओं से मानवता हजारों वर्षों से जूझती रही है। पर अभी विज्ञान और धर्म के आपसी सहयोग से इनसे निपटने का या उस दिशा में काम करने का एक मूल्यवान अवसर हमारे पास है।
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एक धरातल पर यदि मानवता को जीवित रखना है तो सुख और आंतरिक शांति महत्त्वपूर्ण है। अन्यथा हमारे बच्चों और उनके बच्चों के जीवन दुखी, हताश और हमसे भी अल्पायु होने की आशंका रहेगी।
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दुनिया में छाई हिंसा और विनाशकारी घटनाओं ने दिखा दिया कि घृणा से संचालित आधुनिक तकनीक और मनुष्य बुद्धि अत्यधिक विनाश ला सकती है। भौतिक विकास निश्चित रूप से एक सीमा तक खुशी और आरामदेय जीवन शैली में योगदान देता है। पर यह पर्याप्त नहीं है।
सुख के एक और गहन स्तर को प्राप्त करने के लिए हम अपने आंतरिक विकास की उपेक्षा नहीं कर सकते। उदाहरण के लिए, मैं अनुभव करता हूं कि हमारे आधारभूत मानवीय मूल्य हमारी भौतिक क्षमताओं के नए शक्तिशाली विकास के साथ कदम नहीं मिला पाए हैं।
यही कारण है कि मैं वैज्ञानिकों को उच्च स्तर के आध्यात्मिक अभ्यासियों, साधकों और योगियों का परीक्षण करके देखना चाहिए। देखें कि धार्मिक संदर्भ के बाहर उनके आध्यात्मिक अभ्यास के किन प्रभावों से दूसरों को लाभ मिलेगा। एक उपाय यह है कि इन आंतरिक विधियों की कार्यपद्धति को स्पष्ट करने के लिए वैज्ञानिकों की सहायता ली जाए।
हमें चित्त, चेतना और अपनी भावनाओं के संसार के बारे में अपनी समझ बढ़ानी है। ऐसे प्रयोग किए जा चुके हैं, जो दिखाते हैं कि कुछ साधक और योग-अभ्यासी विचलित करने वाली परिस्थितियों से घिरे होने पर भी आंतरिक शांति की स्थिति प्राप्त कर सकते हैं। ऐसे लोगों को हम अधिक सुखी, विध्वंसक भावनाओं से कम प्रभावित होने वाले और दूसरों की भावनाओं के प्रति ज्यादा संवेदनशील देखते समझते हैं।
प्रत्येक व्यक्ति, चाहे धनवान हो अथवा निर्धन, शिक्षित हो या अशिक्षित, उसमें एक शांतिपूर्ण और अर्थपूर्ण जीवन जीने की क्षमता होती है। हमें इस बात की खोज करनी चाहिए कि हम कहां तक और कैसे उसे संभव कर सकते हैं। उस खोज के दौरान स्पष्ट हो जाएगा कि अधिकतर मानसिक विचलन बाहरी कारकों से नहीं बल्कि आंतरिक उभरने वाले क्लेशों से उत्पन्न होते हैं।
आध्यात्मिक उपाय उपलब्ध हैं, लेकिन हमें उन्हें उस वर्ग के लिए भी स्वीकार्य बनाना होगा जिनमें आध्यात्मिक रुझान न हो। ये उपाय तभी व्यापक रूप से असर करेंगे जब वे सबके लिए उपयोगी होंगे। हमें भौतिक विकास को करुणा, सहिष्णुता, क्षमा, संतोष जैसे मानवीय मूल्यों से जोड़ने की आवश्यकता है।