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तब अकाल मृत्यु के लिए पूरा समाज जिम्मेदार है

Mon, 17 Nov 2014 03:12 PM IST
स्वामी चिदानंद सरस्वती
स्वामी चिदानंद सरस्वती Updated Mon, 17 Nov 2014 03:12 PM IST
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cleanliness is social responsibility

उपनिषदों में आया भी है कि ईशावास्यमिदं सर्वम। दूसरा विश्वास है कि पूरी दुनिया ही हमारा परिवार है। इसलिए यह बात धर्म के अनुकूल नहीं हो सकती कि लाखों करोड़ों लोग गंदगी के शिकार बने, उसके कारण बीमारियों और तकलीफों से मरते रहे।

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अपने आप को धर्म अध्यात्म की कसौटियों पर खरा साबित करना है तो पहला कर्तव्य है कि पवित्रता या स्वच्छता को सार्वजनिक मूल्य बनाया जाए। गदंगी से एक भी व्यक्ति बीमार पड़ता है या अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है तो उसकी जिम्मेदारी पूरे समाज की है। कम से कम उन लोगों को यह जिम्मेदारी माननी ही चाहिए जो भगवान की पूजा आराधना करने से पहले हर बार स्नान करते हैं।
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इस देश में गंदगी की जो हालत है उससे कतई नहीं कहा जा सकता हम धर्म प्राण लोग हैं। धार्मिक आस्थाएं और विश्वास हमारे रग-रग में बसती हैं। लेकिन लगभग तीन चौथाई आबादी अस्वच्छता के कारण रोग बीमारियों का शिकार बनती है। घरों और सामूहिक स्थानों पर होने वाली गंदगी को दूर करने का कोई प्रबंध या तंत्र विकसित नहीं हो पाया है। शास्त्रों में जाएं तो ज्ञान से पहले स्वच्छता जरूरी है। कोई समाज उन्नत और शिक्षित है तो वह अनिवार्य रूप से साफ सुथरा भी होगा।
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पवित्रता उससे आगे की बात है। बाहरी स्वच्छता आती है तो आंतरिक जीवन में भी पवित्रता आती है। कोई अपवाद हो सकता है, लेकिन दुनिया में आज तक किसी भी गंदे, गलीच, अस्वच्छ वातावरण में भलाई और नैतिक भावना को प्रतिष्ठा नहीं मिली। स्वच्छता पहला आध्यात्मिक मूल्य है।

भगवान गंदे लोगों पर कृपा कर सकता है, उनमें प्रेरणा जगा सकता है कि वे अच्छे बने। लेकिन वह उन्हें अपनाने से बचता भी होगा। हम निजी,  पारिवारिक जीवन में भी इसका उदाहरण देख सकते हैं। कोई भी मां अपने धूल से सने बच्चे को गोद में नहीं उठाती। उसे गोद में उठाने से पहले नहलाती धुलाती है और तब सीने से लगाती है।

स्वच्छता को हमें व्यापक अर्थ में लेना चाहिए। केवल शरीर और कपड़े चमकदार होने या जहां हम निवास करते हैं, उसके आसपास की गंदगी को हटाने को ही स्वच्छता नहीं कहते। जिस देश-समाज में हम रह रहे हैं, वहां मलीनता का थोड़ा भी विकार हो, तो उसे दूर किया जाना चाहिए।

जैसे आसपास का पानी खराब हो, जमीन पर गंदगी कूड़ा कबाड़ फैला हो, और जो चीजें हम इस्तेमाल करते हैं, उनमें सुघड़पन न हो तो स्वच्छता को आध्यात्मिक मूल्य नहीं बनाया जा सकता। अगर हमारे देश की नदियां गंदी है, तालाबों और जल स्त्रोतो में मलीनता है तो खुद कितना ही साफ सुथरा रहें,  अपने आप को शाबासी नहीं दी जा सकती है।


हम प्रतिदिन अपने इष्ट आराध्य की आराधना करने के लिए पवित्र जल और पवित्र साधना का उपयोग करते हैं तो मनुष्य समाज की सेवा के लिए पवित्रता का ध्यान रखना चाहिए।

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