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शरीर की तरह संवेदनशील संसार
Updated Mon, 30 Jul 2012 12:26 PM IST
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पीठ में चिकोटी काटें तो सिर में दर्द क्यों होता है? हाथ उस जगह को सहलाने के लिए क्यों उठ जाता है और दिमाग उस तकलीफ को दूर करने के लिए क्यों सक्रिय हो जाता है? इस बायोरिदम की तुलना ब्रह्मांड से करते हुए अंतरिक्ष विज्ञानी प्रो. बर्टन हैराल्ड ने इस आधार पर ज्योतिष शास्त्र को तर्क संगत ठहराने की कोशिश की है।
उनका कहना है कि समूचा ब्रह्मांड एक चैतन्य शरीर है। उसके किसी भी हिस्से में आए बदलाव शरीर के प्रत्येक हिस्से को किसी न किसा रूप में प्रभावित करते हैं। कोलकाता स्थित अद्वैत संस्थान के निदेशक स्वामी ब्रह्मात्मजानंद शरीर और ब्रह्मांड के इस रसायन को पुरुष सूक्त केमाध्यम से समझाते हैं।
ऋग्वेद के इस सूक्त में कहा गया है कि ईश्वर के हजार सिर, हजार आंखें, हजार हाथ एवं हजार पैर हैं, इसका अर्थ है कि जिस शक्ति को हम ईश्वर कहते हैं वह सर्वव्यापी वास्तविकता है, जीवन की ज्योति प्रत्येक चीज में है। उनके अनुसार ईश्वर शब्द एक प्रतीक है जो अस्तित्व के विराट रूप को व्यक्त करता है। अस्तित्व केअर्थात ब्रह्मांड और उससे बाहर के किसी भी रूप को समझने या व्यक्त करने के हमने उसे एक रंग, एक रूप और एक नाम दे दिया है।
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उस नाम के बिना हम किसी विचार से तादात्म्य स्थापित नहीं कर सकते, न ही हम एक सार्वभौमिक सत्ता से तादात्म्य स्थापित कर सकते हैं। स्वामी ब्रह्मात्मजानंद के अनुसाक यदि आप ‘सूर्य’ शब्द न जानते हो तो आकाश में स्थित उस आग के गोले का वर्णन किस प्रकार करेंगे? किसी चीज से तादात्म्य स्थापित करने के लिए किसी चीज को जानने के लिए हमें ऐसे शब्द-रूप का प्रयोग कर उसका संबंध उस वस्तु से जोड़ना होता है।
उसे ईश्वर का साकार या व्यक्त रूप कहा गया है। निराकार या अव्यक्त रूप ईश्वर की ब्रह्मांडीय प्रकृति है। योग ईश्वर की ब्रह्मांडीय प्रकृति को मानता है और ज्योतिष इस प्रकृति के नियमों को समझ कर उसके अनुसार जीवन को समायोजित करने का रास्ता बताता या रास्ता निकलने की कोशिश करता है। इसीलिए ज्योतिष लौकिक जीवन से ज्यादा आत्मिक क्षेत्र में सहायता करता है।
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उनका कहना है कि समूचा ब्रह्मांड एक चैतन्य शरीर है। उसके किसी भी हिस्से में आए बदलाव शरीर के प्रत्येक हिस्से को किसी न किसा रूप में प्रभावित करते हैं। कोलकाता स्थित अद्वैत संस्थान के निदेशक स्वामी ब्रह्मात्मजानंद शरीर और ब्रह्मांड के इस रसायन को पुरुष सूक्त केमाध्यम से समझाते हैं।
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ऋग्वेद के इस सूक्त में कहा गया है कि ईश्वर के हजार सिर, हजार आंखें, हजार हाथ एवं हजार पैर हैं, इसका अर्थ है कि जिस शक्ति को हम ईश्वर कहते हैं वह सर्वव्यापी वास्तविकता है, जीवन की ज्योति प्रत्येक चीज में है। उनके अनुसार ईश्वर शब्द एक प्रतीक है जो अस्तित्व के विराट रूप को व्यक्त करता है। अस्तित्व केअर्थात ब्रह्मांड और उससे बाहर के किसी भी रूप को समझने या व्यक्त करने के हमने उसे एक रंग, एक रूप और एक नाम दे दिया है।
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उस नाम के बिना हम किसी विचार से तादात्म्य स्थापित नहीं कर सकते, न ही हम एक सार्वभौमिक सत्ता से तादात्म्य स्थापित कर सकते हैं। स्वामी ब्रह्मात्मजानंद के अनुसाक यदि आप ‘सूर्य’ शब्द न जानते हो तो आकाश में स्थित उस आग के गोले का वर्णन किस प्रकार करेंगे? किसी चीज से तादात्म्य स्थापित करने के लिए किसी चीज को जानने के लिए हमें ऐसे शब्द-रूप का प्रयोग कर उसका संबंध उस वस्तु से जोड़ना होता है।
उसे ईश्वर का साकार या व्यक्त रूप कहा गया है। निराकार या अव्यक्त रूप ईश्वर की ब्रह्मांडीय प्रकृति है। योग ईश्वर की ब्रह्मांडीय प्रकृति को मानता है और ज्योतिष इस प्रकृति के नियमों को समझ कर उसके अनुसार जीवन को समायोजित करने का रास्ता बताता या रास्ता निकलने की कोशिश करता है। इसीलिए ज्योतिष लौकिक जीवन से ज्यादा आत्मिक क्षेत्र में सहायता करता है।