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तो ईश्वर की आराधना की आवश्यकता नहीं:माता अमृतानन्दमयी

Fri, 16 Nov 2012 11:31 AM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क। Updated Fri, 16 Nov 2012 11:31 AM IST
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bhakti not always necessary mata amritanandmayi
ईश्वर विहीन जीवन दो वकीलों के निरन्तर वाद-प्रतिवाद की तरह है। उस वाद का कोई नतीजा नहीं निकलेगा। किसी निर्णय पर पहुँचने के लिये एक न्यायाधीश का होना आवश्यक है। न्यायाधीश न हो तो केवल वाद-प्रतिवाद ही चलता रहेगा, किसी निर्णय पर नहीं पहुँचा जा सकेगा। ईश्वर की आराधना हममें ईश्वरीय गुणों को विकसित करने के लिये की जाती है। यदि इसके बिना भी कोई उन गुणों को अपने जीवन में आत्मसात कर पाता है तो फिर किसी खास विश्वास, आराधना की आवश्यकता नहीं है।
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विश्वास हो या न हो, ईश्वर तो अकाट्य सत्य हैं। उस सत्ता को हम मानें या न मानें उसमें उससे कोई परिवर्तन नहीं होता। भूमि की गुरुत्वाकर्षण शक्ति सत्य है। उसका अंगीकार न करने से वह लुप्त नहीं हो जाती, उसका अस्तित्व बना रहता है। परन्तु यदि कोई उसका निषेध करता हुआ एक ऊँचे इमारत से नीचे कूद जाये तो उसके दुष्परिणाम उसे इसमें विश्वास करने को विवश कर देंगे। इस प्रकार वास्तविकता से मुख मोडना, स्वयं अपनी आँखें बन्द करके अंधकार का दावा करने जैसा है। उस प्रपंच शक्ति, ईश्वर का अंगीकार करके तदनुरूप जीवन जीने से हम शान्ति से जीवन जी पायेंगे।
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माता अमृतानन्दमयी परिचय
माता अमृतानन्दमयी का जन्म 1953 में केरल के एक छोटे से गांव में एक साधारण मछुआरे परिवार में हुआ। बचपन में ही उनका समुद्र के किनारे बैठकर गहन ध्यान में डूब जाना लोगों का ध्यान आकर्षित करता था। भक्ति गीत लिखने और उन्हें भावपूर्वक गाने का शौक इन्हें बचपन से ही था।
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बचपन में लिखे अम्मा के गीतों में ही उनकी गहरी समझ झलकती थी। अम्मा स्वयं महात्मा होने का कोई दावा नहीं करतीं। वे कहती हैं कि मैं बहुत पहले से अपना जीवन संसार की सेवा में अर्पित कर चुकी हूँ। जब जीवन ही अर्पित हो चुका तब फिर किस चीज का दाबा करना कि क्या हो?
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