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जरा हाथ छोड़कर तो देखो ईश्वर तुम्हारा हाथ पकड़ लेगा

Thu, 28 Aug 2014 02:04 PM IST
ओशो/अध्यात्मिक गुरु
ओशो/अध्यात्मिक गुरु Updated Thu, 28 Aug 2014 02:04 PM IST
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amar ujala osho vani on karma and god

समर्पण परमात्मा का पहला चरण है तुम्हारे भीतर। अंधेरा है अभी, लेकिन किरण आ गई। भोर का पहला पक्षी बोला। समर्पण भोर के पहले पक्षी की आवाज है। मुर्गे ने बांग दी। अभी रात है, मगर रात टूटने लगी। अभी रात है, लेकिन रात नहीं रही, तुम्हारे लिए टूट गई। इधर मैं टूटा, उधर रात टूटी। हम नाहक ही बोझ लिए चल रहे हैं।

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मैंने सुना है, एक राजा एक रथ से गुजरता था--जंगल का रास्ता, शिकार से लौटता था। राह पर उसने एक गरीब आदमी को, एक भिखारी को एक बड़ी पोटली--बूढ़ा आदमी और बड़ा बोझ लिए हुए चलते देखा। उसे दया आ गई। उसने रथ रुकवाया और कहा भिखारी को कि तू बैठ जा! कहां तुझे उतरना है, हम उतार देंगे। भिखारी बैठ तो गया, डरता, सकुचाता--रथ, राजा! अपनी आंखों पर भरोसा नहीं आता! कहीं छू न जाए राजा को! कहीं रथ पर ज्यादा बोझ न पड़ जाए!
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ऐसा संकुचित, घबड़ाया, बेचैन! सच में तो डरा हुआ बैठ गया, क्योंकि इनकार कैसे करे? मन तो यह था कि कह दूं कि नहीं-नहीं, मैं और रथ पर! मुझ जैसे गंदे आदमी को, चीथड़े जैसे कपड़े, इस रथ पर बैठाएंगे, शोभा नहीं देती। लेकिन राजा की बात इंनकार भी कैसे करे? बुरा न मान जाए, अपमान न हो जाए। तो बैठ तो गया, बड़े डरे-डरे मन से, और पोटली सिर से न उतारी।

राजा ने कहा, मेरे भाई, पोटली तेरे सिर पर भारी है इसीलिए तो तुझे मैंने रथ में बिठाया, तू पोटली सिर से नीचे क्यों नहीं उतारता? उसने कहा, आप भी क्या कहते हैं? मैं ही बैठा हूं, यही क्या कम है। और पोटली का वजन भी रथ पर डालूं! मुझे बैठा लिया, यही कम सौभाग्य मेरा! नहीं-नहीं, यह मुझसे न हो सकेगा; पोटली का वजन भी रथ पर डालूं!

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अब तुम रथ में बैठे हो, पोटली सिर पर रखे हो तो भी वजन रथ पर ही पड़ रहा है। उतार कर रख दोगे तो भी वजन रथ पर पड़ रहा है। इस भिखारी की दशा है अहंकारी की। वह नाहक ही बोझ ढो रहा है। वह कह रहा है--मैं यह करूं, मैं यह करूं, मैं यह करके दिखाऊं, वह करके दिखाऊं। करने वाला कोई और।


तुम न करो तो भी वही होगा जो होना है। तुम करो तो भी वही होगा जो होना है। तुम नाहक ही पोटली सिर पर लिए बैठे हो। सब उसके हाथों में है। उसके हाथ सब तरफ फैले हुए हैं। इसीलिए तो हिंदुओं ने उसको हजार हाथों का बनाया है। दो हाथ का हो तो हमें संकोच होगा कि भई, पता नहीं किसी और के काम में उलझा हो अभी।

हजार हाथ हैं उसके, अनंत हाथ हैं उसके। तुम जरा अपने को छोड़ो, तो उसके हाथ का सहारा सदा है। वही तुम्हें सम्हाले है। जब तुम जीते हो, तब वही जीता है। जब तुम हारे हो, तब तुम हारे हो। हार उसकी नहीं है। हार तुम्हारी इस भ्रांति की है कि मैं कुछ करके रहूंगा। वह टूटती है भ्रांति कभी।

अगर तुम उसके विपरीत कुछ करते हो तो नहीं होता, नहीं होता तो तुम हारते हो, हारते हो तो रोते हो, दुखी होते हो, पीडि़त-परेशान होते हो। छोड़ दो उस पर, फिर कोई हार नहीं है, फिर कोई विषाद नहीं है। सब संयुक्त है। हम सब जुड़े हैं यह सारा अस्तित्व एक ही लय में बद्ध है। यहां हमें अलग-अलग कुछ करने की बड़ी जरूरत नहीं है।

साभार: ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन, नई दिल्ली

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