क्या आप जानते हैं, मृत्यु के बाद आप कहां जाएंगे, अगर नहीं तो महात्मा बुद्घ से जानें
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जिनके दर्शन के लिए संपूर्ण भारत भूमि के महाश्रेष्ठी अपना धन कोष लुटाने के लिए तैयार रहते थे, वे ही भगवान इस साधन विहीन पंचशाल गाँव में आ रहे हैं, इस समाचार ने जैसे अचानक गांव वालों को भाग्यवान बना दिया। देखते-देखते गांव का कायाकल्प हो गया। गाँव की समूची प्राकृतिक समृद्धि भगवान् तथागत के स्वागत के लिए उमड़ पड़ी। सबके सब अपने हृदय की भावानाओं का अर्घ्य भगवान् के श्रीचरणों में चढ़ाने के लिए उत्सुक थे। इन भोले ग्रामीणों के भाव-संवेदनाओं को भगवान् बुद्ध अनुभव कर रहे थे। वे ठीक समय पर आनन्द, तिष्य, स्थिविर, मौद्गलायन, सेवत, रेवत आदि भिक्षुओं के साथ गाँव में पधारे।
पल्लवों एवं पुष्पों से सज्जित मंच पर विराजमान हो तथागत ने ग्रामीण जनों पर अपनी कृपा की अमृत वर्षा करते हुए मधुर उद्बोधन दिया। इस उद्बोधन में दिशाबोध था। इसके पश्चात् भगवान् बुद्ध ने उनमें से प्रत्येक की कुशल वार्ता पूछी। बुद्ध के आशीषों को पाकर सबके चेहरे पुष्प की भाँति खिल उठे। मिलने के इस उपक्रम में सबसे अन्त में एक कन्या आगे बढ़ी। वह जुलाहे की बेटी थी। अट्ठारह वर्ष की आयु में ही उसकी विचारशीलता सभी को चकित कर देती थी।
बुद्धिमत्ता से समवयस्क ही नहीं, गाँव के वृद्ध जन भी हैरान हो जाते थे। जब उसने बुद्ध के चरण स्पर्श किए, तो उसे देखकर तथागत मुस्कराए। उनकी यह मुस्कान बड़ी ही रहस्यमयी थी। इसमें ज्ञान और प्रेम का अनोखा सम्मिश्रण था। अपनी अलौकिक मुस्कान के साथ उन्होंने उससे पूछा-‘बेटी, कहाँ से आयी हो?’ ‘भन्ते! नहीं जानती हूँ।’ बुद्ध ने एक और सवाल किया-‘कहाँ जाओगी?’ ‘भंते! नहीं जानती हूँ।’ ‘क्या यही जानती हो?’ बुद्ध ने पूछा तो वह बोली-‘जानती हूँ।’ ‘जानती हो?’ बुद्ध ने पूछा, वह बोली-‘कहाँ भगवान्, जरा भी नहीं जानती हूँ।’
लड़की ने दिया बुद्घ को यह जवाब
इस प्रकार की अटपटी बातें सुनकर गाँव के वृद्ध लोग बिगड़ पड़े। भला यह भी कोई ढंग है भगवान् से बातें करने का? उसे डाँटते हुए कहा-‘चारू, यह तू किस तरह से बात कर रही है?’ डाँट-डपट करने वाले वृद्धजनों को बुद्ध ने टोकते हुए कहा-‘उसे डाँटने से पहले आप सब उसकी बातें सुनें।’ फिर उस कन्या की ओर देखते हुए बोले- ‘बेटी चारू, तू इनको समझा कि तूने क्या कहा है।’
इसपर उस कन्या ने कहा, ‘जुलाहे के घर से आ रही हूँ, भगवन्! यह तो आप जानते हैं और गाँव के लोग भी वाकिफ हैं। लेकिन मेरी जीवात्मा कहाँ से आ रही है? मैं किन कर्मों के परिणाम स्वरूप जन्मी हूँ? यह मैं नहीं जानती। मैं यहाँ से वापस जुलाहे के घर जाऊँगी, यह मैं जानती हूँ और आप भी जानते हैं। लेकिन इस जीवन के अन्त में जब मृत्यु होगी, तब मैं कहाँ जाऊँगी, मुझे कुछ पता नहीं है।
इसलिए मैंने आपसे अभी कहा, नहीं जानती हूँ। शुरूआत में तब आपने मुझसे पूछा कि कहाँ से आ रही है? जुलाहे के घर से? तो मैंने कहा जानती हूँ। जब आपने पूछा, कहाँ जा रही है? तो मैंने सोचा, शायद आप पूछ रहे हैं, कहाँ वापस जाएगी आर्थात् क्या जुलाहे के घर जाएगी? तो मैंने कहा, जानती हूँ। पर मैंने जब आपको मुस्कराते हुए देखा, आपकी आँखों में निहारा, तो मैंने सोचा, नहीं-नहीं, भगवान् ऐसे साधारण प्रश्न नहीं पूछ सकते।
वह स्वर्ग को जाता है
वे जरूर पूछ रहे हैं कि ‘कहाँ से,’ अर्थात् ‘किस लोक से’ आ रही है? तेरा जीवन स्रोत क्या है? तो मैंने कहा, मैं नहीं जानती हूँ। इसी तरह आपके ‘कहाँ जाएगी’ के बारे में मैंने सोचा कि आप पूछ रहे हैं, ‘मरने के बाद कहाँ जाओगी?’ तो मैंने कहा, नहीं जानती। बुद्ध ने चारूलता की बातों पर मुस्कराते हुए कहा, तू ने ठीक ही सोचा बेटी। तू सचमुच ही विचारशील और बुद्धिमती है। फिर सभी ग्रामवासियों को सुनाते हुए यह धम्मगाथा कही, ‘अधं भूतो अयं लोको तनुकेत्थ विपस्याति। सकुंतो जालभुत्तो व अप्पो सग्गायगच्छति॥’
यह सारा लोक अंधा बना है, यहाँ देखने वाला कोई विरला ही है। जाल से मुक्त हुए पक्षी की भाँति कोई विरला ही स्वर्ग को जाता है। तथागत ने चारूलता से कहा, बेटी, तेरे पास आँख है, ध्यान की आँख है, विवेक की आँख है। इसी कारण तू देखने समझने में समर्थ है। इन लोगों के पास आँख नहीं है, इसी कारण ये तेरी बातें समझ नहीं सके।
आँख वाला जब कोई बात करता है, तो नेत्रविहीन लोगों को समझ में नहीं आता। आँख वाला कहता है, कैसा प्यारा इन्द्रधनुष है, तो जिनके पास आँख नहीं है, वे उसे मुर्ख समझते हैं। इन सबके बीच एक तू ही है, जो देखने में सक्षम है। अपने कर्मों के जाल से मुक्त हो तू अवश्य अपने गन्तव्य को पहुँचेगी। भगवान् के इन बातों को सुनकर अन्य लोग भी ध्यान के लिए उत्सुक हुए, ताकि वे भी नेत्रवान बन सकें।
(गायत्रीतीर्थ शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार)