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सिर्फ डोले ही नहीं अच्छी सेहत के लिए इन बातों का रखें ध्यान

Wed, 03 Sep 2014 03:49 PM IST
Updated Wed, 03 Sep 2014 03:49 PM IST
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acharya sriram sharma pravachna on health

मनुष्य जन्म अगणित विशेषताओं और विभूतियों से भरापूरा है। हर किसी को यह छूट है कि जितना महापुरुषों, संतों ने अपने आपको ऊंचा उठाया है आप भी अपने आप को उठा सकते हैं लेकिन यह संभव तभी है, जब शरीर और मन पूर्णतया स्वस्थ हो।

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जो औरों के लिए, जितना उपयोगी और सहायक सिद्ध होता है, उसे उसी अनुपात में सम्मान और सहयोग करते उसी से बन पड़ता है, जो स्वस्थ, समर्थ रहने की स्थिति बनाए रहता है।
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इसलिए अनेक दु:खद दुर्भाग्यों और अभिशापों में प्रथम अस्वस्थता को ही माना गया है। प्रयत्न यह होना चाहिए कि वैसी स्थिति उत्पन्न न होने पाए। सच्चे अर्थों में जीवन उतने ही समय का माना जाता है, जितना कि स्वस्थतापूर्वक जिया जा सके।
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कुछ अपवादों को छोड़कर अस्वस्थता अपना निज का उपार्जन है। भले ही वह अनजाने में, भ्रमवश या दूसरों की देखा देखी उसे न्यौता दिया हो। सृष्टि के सभी प्राणी प्राय: जीवन भर निरोग रहते हैं। मरणकाल आने पर जाना तो सभी को पड़ता है।

रोग के इन कारणों को समझें

acharya sriram sharma pravachna on health

मनुष्य की उच्छृंखल आदत ही उसे बीमार बनाती है। जीभ का चटोरापन अतिशय मात्रा में अखाद्य खाने के लिए बाधित करता रहता है। जितना भार उठ नहीं सकता, उतना लादने पर किसी का भी कचूमर निकल सकता है। पेट में अपच भी इसी कारण उत्पन्न होता है। बिना पचा सड़ता है और सड़न रक्त प्रवाह में मिल जाने से जहां भी अवसर मिलता है, रोग का लक्षण उभर पड़ता है।

अस्वच्छता, पूरी नींद न लेना, कड़े परिश्रम से जी चुराना, नशेबाजी जैसी आदत भी स्वास्थ्य को जर्जर बनाने का कारण बनते हैं। खुली हवा और रोशनी से बचना, घुटन भरे वातावरण में रहना भी बीमारी का एक बड़ा कारण है। भय या आक्रोश जैसे उतार- चढ़ाव भी मनोविकार बनते और व्यक्ति को सनकी, कमजोर एवं बीमार बनाकर रखते हैं।
 
शरीर को निरोगी बनाकर रखना कठिन नहीं है। आहार, श्रम एवं विश्राम का संतुलन बिठाकर हर व्यक्ति आरोग्य एवं दीर्घजीवन पा सकता है। दूसरे नियम भी ऐसे नहीं, जिनकी जानकारी आमजन को न हो सके।

उन्हें थोड़े से प्रयास से जाना जा सकता है। आलस्य रहित, श्रमयुक्त व्यवस्थित दिनचर्या का निर्धारण करना सरल है। स्वाद को नहीं- स्वास्थ्य को लक्ष्य करके उपयुक्त भोजन की व्यवस्था हर स्थिति में बनायी जानी संभव है।

सुपाच्य आहार समुचित मात्रा में ही लेना जरा भी कठिन नहीं है। शरीर को उचित विश्राम देकर हर बार तरोताजा बता लेने के लिए कहीं से कुछ लेने नहीं जाना पड़ता। यह सब हमारी असंयम एवं असंतुलन की वृत्ति के कारण ही नहीं सध पाता और हम इस सुर दुर्लभ देह को पाकर भी नर्क जैसी होने और यातना ग्रस्त स्थिति में पड़े रहते हैं।

इस तरह बनें स्वस्थ और सेहतमंद

acharya sriram sharma pravachna on health

शरीर को निरोगी बनाकर रखना कठिन नहीं है। आहार, श्रम एवं विश्राम का संतुलन बिठाकर हर व्यक्ति आरोग्य एवं दीर्घजीवन पा सकता है। दूसरे नियम भी ऐसे नहीं, जिनकी जानकारी आमजन को न हो सके।

उन्हें थोड़े से प्रयास से जाना जा सकता है। आलस्य रहित, श्रमयुक्त व्यवस्थित दिनचर्या का निर्धारण करना सरल है। स्वाद को नहीं- स्वास्थ्य को लक्ष्य करके उपयुक्त भोजन की व्यवस्था हर स्थिति में बनायी जानी संभव है।

सुपाच्य आहार समुचित मात्रा में ही लेना जरा भी कठिन नहीं है। शरीर को उचित विश्राम देकर हर बार तरोताजा बता लेने के लिए कहीं से कुछ लेने नहीं जाना पड़ता। यह सब हमारी असंयम एवं असंतुलन की वृत्ति के कारण ही नहीं सध पाता और हम इस सुर दुर्लभ देह को पाकर भी नर्क जैसी होने और यातना ग्रस्त स्थिति में पड़े रहते हैं।

शारीरिक आरोग्य के मुख्य आधार संयम एवं नियमितता ही है, इनकी उपेक्षा करके मात्र औषधियों के सहारे आरोग्य लाभ का प्रयास मृग मरीचिका के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। आवश्यकता पडऩे पर औषधियों का सहारा लाठी की भांति लिया तो जा सकता है, किन्तु चलना तो पैरों से ही पड़ता है।

शारीरिक आरोग्य एवं सशक्तता जिस जीवनी शक्ति के ऊपर आधारित है उसे बनाये रखना इन्हीं माध्यमों से संभव है। शरीर को प्रभु मन्दिर की तरह महत्त्व दें। बचकाने- छिछोरे बनाये श्रृंगार से उसे दूर रखें। उसे स्वच्छ, स्वस्थ एवं सक्षम बनाना अपना पुण्य कर्तव्य मानें। उपवास द्वारा स्वाद एवं अति आहार की दुष्प्रवृत्तियों पर अधिकार पाने का प्रयास करें।

मौन एवं ब्रह्मचर्य साधना द्वारा जीवनी शक्ति क्षीण न होने दें, उसे अन्तर्मुखी बनाने का अभ्यास करें। श्रमशीलता को दिनचर्या में स्थान मिले। जीवन के महत्त्वपूर्ण क्रमों को नियमितता के शिकंजे में ऐसा कस दिया जाय कि कहीं विश्रृंखलता न आने पाए।

थोड़ी- सी तत्परता बरतकर यह सब साधा जाना संभव है। ऐसा करके इस शरीर से वे लाभ पाए जा सकते हैं जिनकी संभावना शास्त्रकारों से लेकर वैज्ञानिकों तक ने स्वीकार की है।

गायत्री तीर्थ शांतिकुंज, हरिद्वार

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