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लोगों को उनकी वेष-भूषा से नहीं आंकना चाहिए
संपादकीय डेस्क, अमर उजाला
Updated Tue, 06 Mar 2018 02:19 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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जॉन की कहानी, जिसे सलीम की ईमानदारी के बारे में जब एहसास हुआ, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
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जॉन दिल्ली की एक बड़ी कंपनी में प्रेसिडेंट था। उसके पास गाड़ी, बंगला सब था। एक दिन कंपनी के लिए कुछ नई मशीनों का ऑर्डर देने के लिए वह अपने एक पुराने दोस्त के पास नेहरू प्लेस गया। सड़क से लगी हुई एक लंबी-सी इमारत में उसके दोस्त का ऑफिस था। उसने वहीं सड़क के किनारे अपनी गाड़ी पार्क कर दी और दोस्त से मिलने चला गया।
पर जल्दबाजी में जॉन यह देखना भूल गया कि उसकी गाड़ी में पीछे की बाईं हाथ वाली खिड़की का शीशा गलती से खुला रह गया। वहीं सीट पर जॉन का एक काला बैग था, जिसमें महंगा लैपटॉप और ऑफिस के कुछ जरूरी कागजात भी रखे थे। जॉन के जाने के कुछ ही मिनटों बाद सलीम वहां से गुजरा। वह एक मजदूर था, जो दिल्ली पैसे कमाने आया था। जैसे ही उसकी नजर गाड़ी के खुले शीशे पर पड़ी, वह हैरान रह गया। तभी उसने गाड़ी में रखा काला बैग देखा।
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उसके लिए रास्ता एकदम साफ था, वह आराम से बैग उठाता और वहां से निकल जाता। पर उसने ऐसा नहीं किया। वह वहीं पहरा देने लगा। उसे पता था कि अगर वह ऐसा करेगा, तो अपनी दिहाड़ी पर नहीं जा सकेगा। फिर भी वह गाड़ी मालिक का इंतजार करने लगा। लगभग दो घंटे बाद जब जॉन वापस लौटा, तो उसने सलीम को अपनी गाड़ी के सामने ऐसे खड़ा देख पूछा, तुम क्या कर रहे हो मेरी गाड़ी के पास? सलीम जॉन की तरफ पलटा और बोला, आपकी गाड़ी का कांच खुला था। कब से मैं आपका इंतजार कर रहा था।
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जॉन ने सलीम को घूरा, फिर जाकर देखा, गाड़ी का कांच सच में खुला था, और उसका बैग सामने रखा था। जॉन पहले तो कुछ समझ नहीं पाया, फिर गाड़ी में बैठा और चला गया। कुछ देर बाद उसे लगा कि उसने उस शख्स को शुक्रिया तक नहीं कहा, जिसने उसका सामान चोरी होने से बचाया। जॉन ने तुरंत गाड़ी घुमाई और सलीम को शुक्रिया बोलने वापस लौटा, तो देखा वह वहां से जा चुका था। वह उसे कभी नहीं मिला। हम अक्सर लोगों को उनकी वेष भूषा से आंकने लगते हैं, जो ठीक नहीं है।