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Bhishma ashtami 2021: इस दिन व्रत करने से प्राप्त होती है सुसंस्कारी संतान, जानिए भीष्म अष्टमी तिथि और कथा

Tue, 02 Feb 2021 11:36 AM IST
Shashi Shashi धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: Shashi Shashi Updated Tue, 02 Feb 2021 11:36 AM IST
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Bhishma ashtami 2021 date significance and bhishma ashtami vrat katha
भीष्म अष्टमी 2021 - फोटो : social media

माघ मास में शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को भीष्म अष्टमी के रूप में मनाया जाता है। इस बार भीष्म अष्टमी 19 फरवरी दिन शुक्रवार को पड़ रही है। महाभारत में भीष्म पितामह एक अजेय योद्धा थे। उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था। शरशैया पर लेटने के 8 दिनों के पश्चात सूर्य के उत्तरायण होने पर माघ मास में अपना शरीर त्यागा था। माना जाता है कि जिस दिन उन्होंने अपना शरीर त्यागा था उस दिन माघ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि थी। महाभारत के अनुसार पितामह देवी गंगा के और राजा शांतनु के पुत्र थे। माना जाता है कि इस दिन व्रत करने से सुसंस्कारी संतान की प्राप्ति होती है। इस दिन पितामह के निमित्त तर्पण करने से व्यक्ति के पूरे वर्ष के पाप नष्ट हो जाते हैं। यह दिन पितृदोष निवारण के लिए भी उत्तम माना जाता है। तो चलिए जानते हैं गंगापुत्र भीष्म की कथा।

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भीष्म अष्टमी व्रत कथा 

पौराणिक कथा के अनुसार, भीष्म देवी गंगा और राजा शांतनु के आठवें पुत्र थे। इनके जन्म के समय इन्हें देवव्रत नाम दिया गया था। देवव्रत का पोषण मां मां गंगा द्वारा किया गया था। जिसके बाद इन्हें महर्षि परशुराम के पास शास्त्र विद्या प्राप्त करने के लिए भेजा गया था। उन्होंने उनके मार्गदर्शन में महान युद्ध कौशल एवं सीख हासिल की और अजेय योद्धा बन गए।

इनकी शिक्षा पूरी करने के बाद, देवी गंगा देवव्रत को उनके पिता, राजा शांतनु के पास लेकर आयी जिसके बाद उन्हें हस्तिनापुर का राजकुमार घोषित किया गया। इसी दौरान, राजा शांतनु को सत्यवती नाम की एक स्त्री से प्रेम हो गया था। वह उससे विवाह करना चाहते थे। परंतु सत्यवती के पिता ने गठबंधन के लिए एक शर्त रख दी कि राजा शांतनु और उनकी पुत्री सत्यवती की संतानें ही भविष्य में हस्तिनापुर राज्य पर शासन करेंगी।

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इस स्थिति को देखते हुए, देवव्रत ने अपने पिता की खातिर अपना राज्य त्याग दिया और जीवन भर विवाह न करने का प्रण लिया। इसी बलिदान और भीष्म प्रण के कारण, देवव्रत का नाम भीष्म हुआ। उनकी प्रतिज्ञा को भीष्म प्रतिज्ञा कहा गया। यह सब देखकर, राजा शांतनु भीष्म से बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान दिया। अपने जीवनकाल के दौरान, भीष्म ने भीष्म पितामह के रूप में बहुत सम्मान प्राप्त किया।


महाभारत के युद्ध में, वह कौरवों की ओर से थे और उन्होंने पूरी निष्ठा के साथ उनकी ओर से युद्धि किया। भीष्म पितामह ने शिखंडी के साथ युद्ध न करने और उसके ऊपर किसी भी प्रकार से अस्तर न चलाने का संकल्प लिया था। अर्जुन ने शिखंडी के पीछे खड़े होकर भीष्म पितामह पर प्रहार किया, जिससे वे घायल होकर गिर पड़े। भीष्म के कहने पर ही अर्जुन नें उनके लिए बाणों की शय्या बनाई।

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हिंदू धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो व्यक्ति उत्तरायण के शुभ दिन पर अपना शरीर छोड़ता है, उसे मोक्ष प्राप्ति होती है, इसलिए उन्होंने कई दिनों तक बाणों की शैय्या पर प्रतीक्षा की और अंत में अपने शरीर का त्याग किया। यही कारण है कि उत्तरायण भीष्म अष्टमी के रूप में मनाया जाता है।

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