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विक्रमादित्य की यह कहानी आप शेयर करना चाहेंगे

Fri, 17 Oct 2014 10:08 AM IST
रामचरण महेंद्र
रामचरण महेंद्र Updated Fri, 17 Oct 2014 10:08 AM IST
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Worship is great or dispute on god

विक्रमादित्य ने राजसभा में मौजूद विद्वानों और मनीषियों से किसी संदर्भ में पूछा कि सज्जनता बड़ी है या ईश्वर की शक्ति। अलग-अलग लोगों ने इस पर अलग-अलग राय व्यक्त की। अपनी राय को सही साबित करने के लिए उन लोगों ने तर्क भी दिए, जिसकी काट दूसरे सभासदों ने पेश की। इस तरह राजसभा में बहस चल पड़ी। कई दिनों तक विचार-विमर्श होने के बाद भी जब कोई निर्णय नहीं निकल सका, तो उस विषय को कुछ दिनों के लिए स्थगित कर दिया गया।

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उस विवाद से क्लांत राजा अपने राज्य की यात्रा के लिए निकले। दुर्भाग्य से मार्ग में किसी आखेटक जाति के लोगों ने आक्रमण कर दिया। नतीजतन विक्रमादित्य का संबंध शेष सहयोगियों से टूट गया। वह निविड़ वन में अकेले रह गए। काफी देर तक चलते रहने के बाद उन्हें आभास हुआ कि वह भटक गए हैं।
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चलते-चलते उन्हें तेज प्यास लगी। लगा, मानो दम घुट रहा है। मगर कहीं पानी दिखाई नहीं दे रहा था। किसी तरह वह एक कुटिया के पास पहुंचे। वहां एक साधु समाधि में लीन थे। वहां पहुंचते-पहुंचते विक्रमादित्य मूर्च्छित होकर गिर पड़े। गिरते-गिरते उन्होंने पानी के लिए पुकार लगाई।
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कुछ देर बाद जब उनकी मूर्च्छा दूर हुई, तो उन्होंने देखा कि वही संत उनका मुंह धो रहे हैं, पंखा झल रहे हैं और पानी पिला रहे हैं। राजा ने पूछा, आपने मेरे लिए अपनी उपासना क्यों बंद कर दी? संत ने कहा, भगवान ने ऐसा ही चाहा था।


आपकी पुकार सुनकर मुझे लगा कि ईश्वर आपकी सुश्रुषा के लिए प्रेरित कर रहा है। सो मैंने ईश्वर को याद करने के बजाय उसकी प्रेरणा को महत्व देना उचित समझा। राजा विक्रमादित्य को अचानक सभा में कई दिन से चल रहे विवाद का समाधान मिल गया।

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