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Hindi News ›   Spirituality ›   Metaphysical ›   without satsang salvation is not possible

सत्संग से ही कल्याण संभव

Sun, 12 Jan 2014 06:14 PM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Sun, 12 Jan 2014 06:14 PM IST
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चंद्रनगर में एक विद्वान पंडित रहा करते थे। वह कहते थे, विद्या से बड़ा धन दूसरा नहीं। पंडित जी के तीन पुत्र थे। तीनों ने कड़ी मेहनत से शास्त्रों का अध्ययन किया। बड़ा पुत्र आयुर्वेद का, दूसरा धर्मशास्त्रों का और तीसरा नीतिशास्त्र का प्रकांड विद्वान बना। तीनों ने एक-एक ग्रंथ की रचना की।

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चंद्रनगर के राजा पंडितों का बहुत सम्मान करते थे। एक दिन तीनों पंडित अपने ग्रंथ लेकर दरबार में पहुंचे। राजा ने बड़े-बड़े ग्रंथ हाथों में देखे, तो पूछा, आपने इन ग्रंथों में कितने-कितने श्लोक लिखे हैं? तीनों ने बताया, एक-एक लाख। राजा ने कहा, मैं राजकाज में इतना व्यस्त रहता हूं कि तमाम श्लोक सुनना असंभव है। मैं चाहता हूं कि आप तीनों मुझे अपने-अपने ग्रंथ का सार तत्व एक-एक श्लोक सुनाने की कृपा करें।
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सबसे पहले आयुर्वेद के पंडित ने कहा, जीर्ण भोजनमानेयः। यानी पहला भोजन पच जाने के बाद ही दूसरा भोजन करना चाहिए, तभी स्वस्थ रहा जा सकता है। धर्मशास्त्र के पंडित ने कहा, कपलः प्राणिनां दया। अर्थात, ऋषि कहते हैं कि दया से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। नीतिशास्त्र के पंडित ने कहा, शुक्राचार्य कहते हैं- त्यजेद्दुर्जन संगतम। यानी दुर्जन की संगति कदापि न करें। सदाचारियों के सत्संग से ही कल्याण होता है।
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राजा तीनों पंडितों से शास्त्रों का सार सुनकर गद्गद हो उठे। उन्हें पुरस्कार में एक-एक लाख स्वर्ण मुद्राएं देकर ससम्मान विदा किया।

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