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इस एक चीज से मनुष्य को प्रेम, रस और आनंद मिलता है
शिवकुमार गोयल
Updated Wed, 05 Feb 2014 09:25 AM IST
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सभी धर्मशास्त्रों में श्रद्धा का महत्व प्रतिपादित किया गया है। कहा गया है कि श्रद्धा-निष्ठा के साथ किया गया प्रत्येक सत्कर्म फलदायक होता है। इसलिए कहा गया है कि श्रद्धां देवा यजमाना वायुगोपा उपासते। श्रद्धां हृदस्य याकूत्या श्रद्धया विन्दते वसु। अर्थात देवता, संतजन, विद्वान, यजमान, दानशील, बलिदानी सब श्रद्धा से कर्म की उपासना करते हैं, इसलिए सुरक्षित रहते हैं।
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श्रद्धा को सुमतिदायिनी, कामायनी, कात्यायनी बताकर उसकी उपासना की गई है। वैदिक ऋचा में कहा गया है, हे परमप्रिये श्रद्धे, तेरी कृपा से मैं ऐसा व्यवहार करूं, जिससे संसार का उपकार हो सके। हे सुमतिदायिनी श्रद्धे, मैं जो कुछ आहुति, दान व बलिदान करूं, उसे उपयोगी और सर्वहितकारिणी बना।
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हे कामायनी श्रद्धे, मेरी अनासक्त कामना है कि मेरे कृत्यों से दान और बलिदान की प्रेरणा उदित होती रहे। हृदय से जब श्रद्धा की उपासना होती है, तब अनंत ऐश्वर्य अनायास ही प्राप्त होने लगते हैं।
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ऋग्वेद में कहा गया है, श्रद्धया अग्निः समिध्यते। यानी श्रद्धा से ऐसी अग्नि प्रदीप्त होती है, जो मनुष्य को प्रेम, रस, आनंद और अमृत प्रदान कर उसका लोक-परलोक सफल बनाती है। श्रद्धा ही वृद्धजनों, माता-पिता, गुरु के प्रति कर्तव्यपालन करने, मातृभूमि के लिए प्राणोत्सर्ग करने, समाज व धर्म की सेवा में संलग्न होने की प्रेरणा का स्रोत है।