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मुक्ति पाने के लिए खुद को अज्ञानी और बुद्घिहीन क्यों कहते हैं भक्त

Tue, 11 Feb 2014 09:31 AM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Tue, 11 Feb 2014 09:31 AM IST
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why you forget me god?

ऋषि-मुनियों, संत-महात्माओं तथा भक्तों ने भगवान से अपने अवगुणों को अनदेखा कर शरण में लेने की प्रार्थना की है। संत कवि सूरदास प्रभु मेरे अवगुण चित न धरो पंक्तियों में विनयशीलता का परिचय देते हुए शरणागत करने की प्रार्थना करते हैं, तो तुलसीदास प्रभु राम से पूछते हैं, काहे को हरि मोहि बिसारो।

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संत पुरंदरदास खुद को दुर्गुणों का दास बताते हुए ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर कहते हैं- कूट-कूटकर मुझमें भरे हुए हैं दुर्गुण, नहीं किया पर तुमने मेरा छिद्रान्वेषण। गुरु नानकदेव जी मात्र भगवान श्रीराम को विपत्ति का साथी बताते हुए कहते हैं- संग सखा सभि तज गए, कोई न निबाहियो साथ, कहु नानक इह विपत्ति में, टेक एक रघुनाथ।
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रवींद्रनाथ ठाकुर गीतांजलि में प्रार्थना करते हैं, भगवान अपनी चरण-धूलि के तल में मेरे शरीर को नत कर दो। मेरे समस्त अहंकार को अपने दिव्य नैनों के जल में डुबो दो। मैं चाहता हूं चरम शांति, अपने प्राणों में तुम्हारी परम कांति। तुम मेरे हृदय कमल दल में वास कर जाओ।
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महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला निखिल वाणी में प्रभु से याचना करते हैं, दुरित दूर करो नाथ, अशरण हूं गहो हाथ। अर्चना में वह कहते हैं, जब तक शत मोहजाल, घेर रहे हैं कराल, जीवन के विपुल व्याल, मुक्त करो विश्वनाथ।

सभी शास्त्रों में विनयशीलता और अहंकारशून्यता को ईश्वर की भक्ति प्राप्त करने का साधन बताया गया है।

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