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जिंदगी से भी कीमती चीज क्या हो सकती है, जानना चाहेंगे?

Tue, 23 Sep 2014 09:11 AM IST
ओशो
ओशो Updated Tue, 23 Sep 2014 09:11 AM IST
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When death came just to name themselves forward

नूरी, रक्काम और कुछ अन्य सूफी फकीरों पर काफिर होने का आरोप लगा। आरोप के साबित होने पर उन्हें मृत्युदंड की सजा सुनाई गई। हालांकि सभी फकीरों ने इस आरोप को नकारा ही कि उन्होंने ऊपर वाले मालिक की शान में कोई गुस्ताखी की है। उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग यह सजा तय कर रहे हैं, जरूरी नहीं कि वे सही ही कर रहे हों।

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हो सकता है कि ऊपर वाले की निगाह में वे गुनाह ही कर रहे हों। मगर हम तो यही मानते हैं कि जो भी हो रहा है, वह ऊपर वाले की मर्जी है, और वह ठीक ही है। बहरहाल मौत की सजा पर अमल की बारी आई। जल्लाद नंगी तलवार लेकर रक्काम के निकट आया। वह उन्हें पकड़ कर गर्दन रेतने ही वाला था कि नूरी उठे और रक्काम को हटाते हुए जल्लाद के सामने खुद को पेश कर दिया।
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सजा पर अमल का आदेश देने वाले अफसर से उन्होंने विनती की कि पहले उन्हें सजा दी जाए। नूरी अत्यंत प्रसन्नता और नम्रता के साथ आगे आए थे। वहां मौजूद भीड़ में सन्नाटा छा गया। आदेश देने वाले अफसर ने कहा, हे नूरी, तलवार ऐसी चीज नहीं है, जिससे मिलने के लिए लोग इतने उत्सुक और व्याकुल हों। फिर तुम्हारी तो अभी बारी भी नहीं आई है।
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नूरी ने पहले जैसी शांति और विनय बनाए रखते हुए कहा, प्रेम ही मेरा धर्म है। बेशक जीवन संसार में सबसे मूल्यवान वस्तु है, लेकिन प्रेम के मुकाबले वह कुछ भी नहीं है। जिसे प्रेम उपलब्ध हो जाता है, उसके लिए जीवन खेल से ज्यादा नहीं है। संसार में जीवन श्रेष्ठ है, पर प्रेम जीवन से भी श्रेष्ठ है, क्योंकि वह संसार का नहीं, सत्य का अंग है। और प्रेम कहता है कि जब मृत्यु आए, तो अपने मित्रों के आगे हो जाओ तथा जब जीवन मिलता हो, तो पीछे। इसे हम प्रार्थना कहते हैं।

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