जब एक गाय ने बना दिया धनवान इंसान को गरीब
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आठों वसु अपनी-अपनी पत्नियों के साथ पृथ्वी लोक पर निकले। कई तीर्थ और देवताओं के दर्शन करते हुए वे वसिष्ठ ऋषि के आश्रम में पहुंचे। वसिष्ठ का आश्रम उन दिनों तप, ज्ञान और साधना के लिए विख्यात था। वहां अलौकिक शांति छाई हुई थी। वसु और उनकी पत्नियां देर तक आश्रम की प्रत्येक वस्तु को देखती रहीं। आश्रम की यज्ञशाला, साधना-भवन और स्नातकों के निवास आदि सभी को स्वच्छ, सुसज्जित एवं सुव्यवस्थित देखकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। बड़ी देर तक वसुगण ऋषियों के तप, ज्ञान, दर्शन और उनकी जीवन व्यवस्था पर चर्चा करते रहे और आह्लादित होते रहे।
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इसी बीच वसु प्रभास एवं उनकी पत्नी आश्रम के उपवन की ओर निकल आए। वहां ऋषि की कामधेनु नंदिनी हरी घास चर रही थी। गाय की सुंदरता, भोली आकृति, धवल वर्ण को देखकर वे दंग रह गए। प्रभास की पत्नी तो उसे पाने के लिए व्याकुल हो उठीं। उन्होंने वसु प्रभास से कहा, स्वामी! नंदिनी की मृदुल दृष्टि ने मुझे विमोहित किया है। मुझे इस गाय में आसक्ति हो गई है। अतएव इसे अपने साथ ले चलिए।
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प्रभास हंसकर बोले, देवी! औरों की प्यारी वस्तु को देखकर लोभ करना और उसे अनाधिकार पाने की चेष्टा करना पाप है। उस पाप के फल से मनुष्य तो मनुष्य, हम देवता भी नहीं बच सकते, क्योंकि ब्रह्मा जी ने कर्मों के अनुसार ही सृष्टि की रचना की है। हम अच्छे कर्मों से देवता हुए हैं।
बुराई पर चलने के लिए हमें विवश मत करो, अन्यथा कर्म-भोग का दंड हमें भी भुगतना पड़ेगा। फिर उन्होंने विश्वामित्र का उदाहरण दिया कि किस तरह राजा विश्वामित्र का मन नंदिनी को देखकर ललचाया था और परिणाम में राज-पाट आदि सब कुछ नष्ट हो गया था।