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धार्मिक काम के पैसा का ऐसा इस्तेमाल आप सोच कर हैरान रह जाएंगे

Mon, 05 May 2014 10:57 AM IST
तिक न्यात हान्ह
तिक न्यात हान्ह Updated Mon, 05 May 2014 10:57 AM IST
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Two versions of the Scriptures, which can not be seen

जापान में टेटसुगेन नाम का एक जैन साधक था। उसे एक दिन ख्याल आया कि धर्मसूत्र केवल चीनी भाषा में ही हैं, उन्हें अपनी भाषा में प्रकाशित करना चाहिए। इस ख्याल को अमली जामा पहनाने के लिए सात हजार ग्रंथ प्रकाशित किए जाने थे। इस योजना के लिए जरूरी धन इकट्ठा करने के लिए वह देश भर में घूमे। लोगों ने उदार हृदय से मदद की।

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करीब दस साल में ग्रंथों के प्रकाशन के लिए धन इकट्ठा हो पाया। वह प्रकाशन के काम में लगे ही थे कि एक नदी में बाढ़ आई, और बाढ़ के बाद अकाल। टेटसुगेन ने ग्रंथों के लिए जो धन इकट्ठा किया था, वह लोगों को बाढ़ और अकाल से उबारने में खर्च कर दिया। हालात थोड़े अनुकूल हुए, तो फिर से वह ग्रंथों के लिए धन इकट्ठा करने निकले। इस काम में उन्हें कुछ साल और लग गए। ग्रंथों के प्रकाशन की फिर योजना बनी। दुर्योग से देश में महामारी फैल गई। टेटसुगेन ने जितना धन इकट्ठा किया, वह फिर जनसेवा में खर्च कर दिया।
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ग्रंथों के प्रकाशन के लिए टेटसुगेन ने तीसरी बार धन इकट्ठा करने का निश्चय किया। इस बार चार-पांच वर्ष लग गए। इस बार प्रकाशित करने की इच्छा पूरी हो पाई। जापानी भाषा में प्रकशित इन ग्रंथों की पहली प्रति क्योटो के ओबाकू विहार में रखी गई। उन पर छपा तो था पहला संस्करण, पर विहार में उन प्रतियों पर लिखा गया-तीसरा संस्करण। पिछले दो संस्करण भगवान बुद्ध के पास हैं।

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