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धर्मों में उल्लेख, हिंसक जानवर के साथ प्रेम से पेश आएं

Sat, 25 Nov 2017 09:10 AM IST
सुरेंद्र शर्मा
सुरेंद्र शर्मा Updated Sat, 25 Nov 2017 09:10 AM IST
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Treat the violent animals with love

धरती पर यदि सिंह, व्याघ्र आदि हिंस्र जन्तुओं के विनाश पर यदि मनुष्य उतर पड़े, तो फिर न केवल धरती का आंगन इनसे रहित होकर सौंदर्य हीन हो जाएगा, बल्कि संतुलन बिगड़ जाने से कई संकट भी आ खड़े होंगे। पशुओं के खुरों से, पंजों से वन्य प्रदेशों की जमीन की खुदाई, गढ़ाई, कुटाई होती रहती है। इससे उसमें वनस्पति उगाने की क्षमता बनी रहती है। पोली जमीन उनकी भागदौड़ से कड़ी होती है और आंधी में उड़ने और वर्षा में बहने से बच जाती है। खार खड्डे नहीं बनते। वन्य पशुओं का मलमूत्र उस क्षेत्र की जमीन में उपयोगी खाद देता रहता है और वहां की उर्वरता बनी रहती है।

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अफ्रीका को बसाते समय यूरोपीय लोगों ने बड़ी बर्बरता से प्राणियों का संहार किया। शिकारियों के लिए उन दिनों अफ्रीका स्वर्ग था और सिंह, व्याघ्र, चीते, गेंडे, हाथी, जिराफ आदि के चमड़े से सारा यूरोप ढक गया। धातुओं और वस्त्रों के स्थान पर इस सस्ते और सुन्दर चमड़े की हर चीज बनने लगी। संहार को रोकने के लिए समय-समय पर समाज के नायकों ने प्रयत्न किए हैं।
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बौद्ध और जैन धर्मों ने अध्यात्म और नीति की पृष्ठभूमि में अहिंसा का प्रचार किया और मनुष्यों की ही तरह पशु-पक्षियों के साथ भी करुणा की प्रेरणा दी। सम्राट अशोक ने इस संदर्भ में कुछ कड़े प्रतिबंध लगाए थे, उनका उल्लेख मौजूद शिलालेखों में मिलता है। इंग्लैंड के शासक तृतीय हेनरी ने सन 1217 में वन्य पशुओं के रक्षा संबंधी कानून बनाए थे।

फ्रांस ने भी सन 1844 में ऐसा ही कानून बनाया। चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस ने पक्षियों को अंधाधुंध मारने का निषेध किया था। वन्य पशु-पक्षी मनुष्य के शत्रु नहीं, मित्र हैं। जब फिजी द्वीप बसाया गया, तो वहां चूहे और कौओं के अभाव से खेतों में होने वाले कीड़े फसल को बुरी तरह से बर्बाद करने लगे। रासायनिक घोल छिड़कने जैसे उपचारों से जब कोई काम चलता न दिखा, तो भारत से चूहे और कौए पकड़ कर वहां ले जाए गए और बसाए गए, तब कहीं जाकर कीड़ों का उपद्रव काबू में आया।

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