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ज्ञानी होते भी, तब बेकार हो जाता है आपका ज्ञान
शिवकुमार गोयल
Updated Tue, 24 Dec 2013 12:15 PM IST
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एक बार सत्संग के दौरान परम भागवत संत अखंडानंद सरस्वती ने अपने गुरु उड़िया बाबा से पूछा, महाराज, पंडित कौन है? उड़िया बाबा ने बताया, शास्त्र में कहा गया है- आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिक्षा धर्म नित्यता। यमर्थात्राकर्षन्ति स वै पंडित उच्यते। अर्थात, जिन्हें अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान है, जो धर्मानुसार जीवन जीते हैं, दुख सहन करते हैं और जो धन के लालच में सही रास्ते से नहीं भटकते, वे ही पंडित कहलाते हैं।
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एक अन्य श्लोक कहते हुए उड़िया बाबा बताते हैं, जो ढंग से सोच-विचार कर काम करता है, किसी भी काम को अधूरा नहीं छोड़ता, समय का दुरुपयोग नहीं करता, जिसने इंद्रियों पर नियंत्रण कर लिया है, वही पंडित है।
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उपनिषद में ज्ञानी (पंडित) की परिभाषा में कहा गया है, सभी प्राणियों के अंदर समान आत्मा है, ऐसा अनुभव करनेवाला किसी भी प्रकार के भेदभाव से मुक्त-समदर्शी व्यक्ति ही सच्चा ज्ञानी है। इस अवस्था में पहुंचने पर ज्ञानी मनुष्य को आत्मा सर्वःभूतमय की अनुभूति होने लगती है।
स्वामी रामतीर्थ ने एक बार कहा था, जिसके हृदय में प्रेम नहीं है, संवेदना नहीं है, करुणा नहीं है, समदर्शी की भावना नहीं है और भगवान के प्रति भक्ति-भावना नहीं है, वह चाहे जितना बड़ा ज्ञानी-पंडित हो, उसका ज्ञान निर्रथक है। आत्मा-परमात्मा का ज्ञान रखनेवाला तथा सुख-दुख में सम रहनेवाला ही सच्चा पंडित है।