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एक मंत्र जिसे सुनने मात्र से मनुष्य को विष्णु लोक में स्थान मिलता है
श्री गोवर्धन
Updated Tue, 29 Sep 2015 09:39 AM IST
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गुरुदेव ने श्रीरामानुजाचार्य को अष्टाक्षर नारायण मंत्र का उपदेश देकर समझाया, बेटा! यह मंत्र एक बार भी जिसके कान में पड़ जाता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है। मरने पर वह भगवान नारायण के दिव्य बैकुंठ धाम में जाता है। इसे अनाधिकारी को मत सुनाना।
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रामानुजाचार्य के मन में द्वंद्व शुरू हुआ कि जब इस मंत्र को एक बार सुनते ही घोर पापी भी पाप-मुक्त हो जाता है, तब लोग मृत्युपाश में क्यों पड़े रहें। उन्हें भी यह मंत्र सुनाया जाए। लेकिन गुरु आज्ञा का उल्लंघन महापाप है। उससे बचने के लिए क्या किया जाए? मन में संघर्ष शुरू हुआ। रात्रि गहराने लगी। सभी सो गए थे; किंतु रामानुज जाग रहे थे। वह धीरे से उठे और कुटिया के छप्पर पर चढ़कर पूरी शक्ति से चिल्लाने लगे, नमो नारायणाय! नमो नारायणाय!
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आसपास के सभी लोग चौंककर जाग उठे। गुरुदेव ने रामानुज को छप्पर से नीचे आने को कहा। नीचे आने पर उन्होंने पूछा, तू यह क्या रहा है? रामानुज गुरु को देखकर थर-थर कांपने लगे। गुरु ने पूछा, ठंड लग रही होगी बेटा! तबीयत तो ठीक है न? पूछते हुए उन्होंने शिष्य के माथे पर हाथ रखा कि बुखार तो नहीं है। सब सामान्य था।
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चिंतित गुरु ने पूछा, क्या बात है बेटा? गुरु को इस तरह व्यथित देखकर रामानुज ने उत्तर दिया, भगवान्! आपकी आज्ञा भंग करने का महापाप हुआ है। उसका भान था मुझे, इसलिए नरक में जाने का मुझे कोई दुख नहीं है। आप यह बताइए कि यह मंत्र जिनके भी कानों में गया है, वे सब प्राणी बैकुंठ धाम तो पहुंच जाएंगे न।
गुरुदेव के नेत्र भर आए। उन्होंने रामानुज को हृदय से लगाते हुए कहा, तू ही सच्चा शिष्य है। प्राणियों के उद्धार की जिसे इतनी चिंता है, वही प्राणियों का उद्धारक बनेगा।