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यमराज नहीं, कोई और ले जाता है नर्क की ओर...

Wed, 09 Apr 2014 10:34 AM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Wed, 09 Apr 2014 10:34 AM IST
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These elements are a constraint for satisfaction and peace

सभी धर्मग्रंथों में काम, क्रोध और लोभ को पतन का कारण बताया गया है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेत वयं त्यजेत।। यानी काम, क्रोध और लोभ नरक के द्वार हैं। ये तीनों आत्मा को नष्ट कर देते हैं, इसलिए इनका त्याग करना ही उचित है।

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इच्छाओं की पूर्ति में बाधा आने से अनायास क्रोध पनपता है। क्रोध के आवेग से बुद्धि नष्ट हो जाती है। बुद्धि नष्ट हो जाने से पतन का रास्ता साफ हो जाता है। पग-पग पर देखने में आता है कि कामनाओं का कभी अंत नहीं होता। आकांक्षा संतोष और शांति में बाधा डालने वाली होती है।
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सुविख्यात दार्शनिक सिसरो ने कहा था, इच्छाओं की प्यास कभी नहीं बुझती और न आदमी कभी पूर्ण रूप से संतुष्ट हो सकता है। स्वामी विवेकानंद ने भी कहा है, कामना सागर की भांति अतृप्त है। ज्यों-ज्यों सागर में जल की आपूर्ति होती रहती है, त्यों-त्यों सागर का कोलाहल बढ़ता रहता है।
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क्रोध से बचने के लिए शास्त्रों में उपाय भी बताए गए हैं। ऋग्वेद में कहा गया है, कामनाएं कम करने के लिए सात्विक और मर्यादापूर्वक जीवन जीना चाहिए। क्रोध को नम्रता से परास्त किया जा सकता है। संत कबीरदास क्रोध से मुक्ति का साधन सत्पुरुषों और संतों का सत्संग बताते हुए कहते हैं- दसों दिसा से क्रोध की, उठी अपर बल आगि। सीतल संगति साधु की, तहां उबरिये भागि।।

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