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इसलिए भीष्म पितामह द्रौपदी के चीर हरण का नजारा देखते रहे
स्वामी रामसुखदास
Updated Tue, 15 Sep 2015 03:23 PM IST
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महाभारत का युद्ध अंतिम दौर में था। भीष्म पितामह शरशय्या पर लेटे थे। युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ उनका धर्मोपदेश सुन रहे थे। तभी द्रौपदी वहां आई और बोली, पितामह मेरी भी एक शंका है। भीष्म ने स्नेहपूर्वक कहा, बोलो बेटी। इस पर द्रौपदी बोली, पितामह! मैं पहले ही क्षमा याचना कर लेती हूं। प्रश्न जरा टेढ़ा है।
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भीष्म बोले, बेटी, जो पूछना है, निर्भय होकर पूछो। द्रौपदी ने कहा, पितामह! जब भरी सभा में दु:शासन मेरा चीरहरण कर रहा था, उस समय आप भी वहां थे, किंतु आपने मेरी सहायता नहीं की। उस समय आपका विवेक कहां चला गया था? एक अबला के चीरहरण का दृश्य आप अपनी आंखों से किस प्रकार देख सके थे?
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यह सुनकर पांडव चौंक उठे। भीष्म गंभीर हो गए। यह प्रश्न कोई पहली बार उनके सामने नहीं आया था। जिस समय यह घटना घटी थी, उस समय भी यही प्रश्न उनके सम्मुख था। उसके बाद जब कभी उन्हें इस घटना का स्मरण होता, तो वह प्रश्न रूप में ही उनके सामने रहता।
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आज द्रौपदी ने स्पष्ट पूछ लिया था। भीष्म बोले, बेटी, तुम ठीक कहती हो। असल में बात यह है कि मैं उस समय दुर्योधन का पाप से पूर्ण अन्न खा रहा था। वही पाप मेरे मन और मस्तिष्क में समाया हुआ था। मैं देख रहा था कि यह अत्याचार हो रहा है, अधर्म हो रहा है, लेकिन उसको रोक नहीं सका। मैं चाहता था कि ऐसा न हो, किंतु मना करने का सामर्थ्य मुझमें नहीं रह गया था...।
लेकिन आज आप में सहसा यह ज्ञान कैसे प्रकट हो रहा है?, द्रौपदी ने बीच में उन्हें टोकते हुए पूछा। भीष्म ने कहा, बेटी, आज अर्जुन के बाणों ने मेरा वह सारा रक्त बाहर निकाल दिया है, जिसमें दुर्योधन के पाप के अन्न का प्रभाव था। अब तो मैं रक्तविहीन प्राणी हूं, इसलिए मेरा विवेक आज सजग है। मेरे शरीर से पाप के अन्न से बना रक्त निकल गया है। इसके बाद द्रौपदी के पास कुछ कहने को नहीं रहा।