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इसलिए हर व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी दुःख जरूर आता है

Tue, 02 Sep 2014 12:47 PM IST
आचार्य तुलसी
आचार्य तुलसी Updated Tue, 02 Sep 2014 12:47 PM IST
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The boat is stuck in the fence life

उस आश्रम में कई शिष्य पढ़ा करते थे। आश्रम के अधिष्ठाता संत निरंकार देव बड़े जतन से शिष्यों को पढ़ाते। एक दिन एक शिष्य ने उनसे पूछा, बाबा, सुख तो समझ में आता है, पर दु:ख क्यों है, यह समझ में नहीं आता।

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उसकी बात की अनसुनी कर संत ने कहा, मुझे दूसरे किनारे पर जाना है। चलो, घाट पर बंधी नाव खोलो। उस शिष्य ने फिर अपना सवाल दोहराया। गुरु ने फिर उस पार जाने की तैयारी पर जोर दिया। शिष्य को लगा कि गुरु उसके सवाल को महत्व नहीं दे रहे हैं। तैयारी करते हुए उसने तीसरी बार फिर अपना सवाल किया। अब गुरु को कहना पड़ा कि तुम्हारे सवाल का जवाब मैं नाव में बैठकर दूंगा।
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नाव में बैठकर स्वामी निरंकार देव ने एक चप्पू से नाव चलानी शुरू की। इस कोशिश में नाव आगे बढ़ने के बजाय पानी में एक ही जगह गोल-गोल घूमने लगी। कुछ देर तक तो शिष्य को समझ में ही नहीं आया कि ऐसा क्यों हो रहा है। कारण समझ में आने पर शिष्य बोला, गुरुदेव, अगर आप एक ही चप्पू से नाव चलाते रहे, तो हम यहीं भटकते रहेंगे, कभी किनारे पर नहीं पहुंच पाएंगे।


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उसकी बात सुनकर स्वामी निरंकार देव बोले, अरे तुम तो बहुत समझदार हो। अब तो तुम्हारे सवाल का जवाब भी मिल गया होगा। शिष्य को अनमना-सा ताकता देखकर गुरु ने स्पष्ट उत्तर किया, अगर जीवन में सुख ही सुख होगा, तो जीवन नैया यों ही गोल-गोल घूमती रहेगी और कभी भी किनारे पर नहीं पहुंचेगी।

जिस तरह नाव को साधने के लिए दो चप्पू चाहिए, ठीक से चलने के लिए दो पैर चाहिए, काम करने के लिए दो हाथ चाहिए, उसी तरह जीवन में सुख के साथ दुःख भी होने चाहिए। वरना जीवन की नाव भंवर में फंस जाएगी।

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