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जब उसने नदी में बहते अपने ही शव को देखा
भिक्षु धर्मपाल
Updated Tue, 25 Nov 2014 03:05 PM IST
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बुद्ध की शिक्षा की महत्ता सुनकर एक साधक उनकी खोज में निकला। बुद्ध उन दिनों प्रव्रज्या पर थे। घूम-घूमकर वह लोगों को शिक्षा दे रहे थे। उन्होंने नियम बना रखा था कि किसी बस्ती में रात में नहीं रुकेंगे।
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शाम के वक्त घरों के छप्पर से चूल्हे का धुआं ऊपर उठते देखते ही भिक्षुओं को बस्ती से बाहर निकल आने का निर्देश था। इस स्थिति में ठीक-ठीक यह पता लगाना कठिन था कि बुद्ध कहां मिलेंगे। इसलिए उनकी खोज में साधक की यात्रा ज्यादा ही लंबी हो गई।
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फिर भी उस साधक ने बुद्ध की खोज में कई साल समर्पित किए। लोगों से और बुद्ध से मिलकर आए ग्राम्यजनों से पूछते-पूछते आखिर वह उस जगह पहुंच ही गया, जहां बुद्ध ठहरे हुए थे। उस स्थान पर जाने के लिए एक नदी पार करनी होती थी। साधक नदी पार करने के लिए नाव पर सवार हुआ।
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जब नाविक नाव चला रहा था, तब साधक चारों ओर देख रहा था। मंझधार में पहुंच कर साधक ने किसी चीज को अपनी ओर आते देखा। धीरे-धीरे वह चीज तैरते हुए जब उसके नजदीक आई, तो उसने देखा कि वह एक मनुष्य का मृत शरीर था। जब वह शरीर बिल्कुल ही पास आ गया, तो शव के चेहरे को देखकर वह आश्चर्यचकित रह गया।
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उसे लगा कि यह तो उसकी अपनी ही काया है। शव को देखते-देखते उसका तादात्म्य इतना घनीभूत हो गया कि उसने अपनी बांह पर चिकोटी काटकर देखा। शरीर में कोई संवेदना ही नहीं हो रही थी। उसने अपना नियंत्रण खो दिया था।
अपने शरीर को शांत और बेजान नदी के प्रवाह में बहता हुआ देखकर वह ऊंची आवाज में रोने लगा। वह पल उसकी मुक्ति की शुरुआत थी। उसने देखा कि बुद्ध नदी की धारा पर चलते हुए आ रहे हैं।