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इस संत के काम को जानकर आपकी हैरानी का ठिकाना नहीं रहेगा

Thu, 12 Feb 2015 08:21 AM IST
आनंद स्वामी
आनंद स्वामी Updated Thu, 12 Feb 2015 08:21 AM IST
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That man also like branch of tree

स्वामी सत्यानंद नामक एक संन्यासी किसी गांव से गुजर रहा था। अचानक कोई आकर सत्यानंद पर छड़ी से वार किया और भागने लगा। संन्यासी जमीन पर गिर गया, उसने देखा कि वार करने वाले आदमी की छड़ी उसके हाथ से छूट गई है। संन्यासी संभला, उसने छड़ी उठाई और उस आदमी के पीछे यह कहते हुए भागा कि अपनी छड़ी तो लेते जाओ! संन्यासी ने उस आदमी को छड़ी सौंप दी।

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इस बीच वहां काफी भीड़ इकट्ठा हो गई। किसी ने स्वामी से पूछा कि इस आदमी ने तुम्हें इतनी जोर से मारा, लेकिन तुमने उसे कुछ नहीं कहा? उसे पकड़वाने के बदले उसे माफ कर दिया और जिस छड़ी से उसने वार किया था, वह भी लौटा दी।
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सत्यानंद ने कहा, 'उसने मुझे मारा, बात यहीं खत्म हो गई। यह ऐसा ही है, जैसे मैं किसी पेड़ के नीचे से निकलूं और उसकी एक शाखा मुझ पर गिर जाए! तब मैं क्या करूंगा? लोगों ने कहा, लेकिन पेड़ की शाखा तो निर्जीव है। वह आदमी तो जिंदा और विचारशील है! हम किसी शाखा से कुछ नहीं कह सकते, उसे दंड नहीं दे सकते। और हम पेड़ को भी भला-बुरा नहीं कह सकते, क्योंकि वह पेड़ है, जो सोच-विचार नहीं सकता।'
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सत्यानंद ने कहा, 'मेरे लिए यह आदमी पेड़ की शाखा जैसा ही है। यदि मैं पेड़ से कुछ नहीं कह सकता, तो इस आदमी से क्यों कहूं? जो हो गया, सो हो गया। मैं उसकी व्याख्या नहीं करना चाहता। और वह तो हो ही चुका है, वह बीत चुका है। अब उसके बारे में सोचकर चिंता क्या करना?'


स्वामी सत्यानंद का मन एक संत का मन है। वह चुनाव नहीं करता, सवाल नहीं उठाता। वह जो कुछ भी होता है, उसे वह उसकी संपूर्णता में स्वीकार कर लेता है। यह स्वीकार ही उसे रोष और द्वेष से मुक्त करता है।

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