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इंद्र को भी जन्म लेकर चींटी की योनी में जाना पड़ता है
-जातक कथा
Updated Mon, 13 Oct 2014 10:37 AM IST
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इंद्र ने विशाल प्रासाद बनाने का निश्चय किया। इसके लिए विश्वकर्मा को नियुक्त किया। सौ वर्ष बीत जाने पर भी भवन पूरा न हुआ। इससे विश्वकर्मा दुखी रहने लगे। अन्य कोई उपाय न देख उन्होंने ब्रह्मा जी से अपनी समस्या बताई।
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ब्रह्मा ने बटुक का रूप धारण किया और इंद्र से पूछा, इस भवन को बनाने में कितने विश्वकर्माओं को लगाया है। इस पर हैरान इंद्र ने कहा कि विश्वकर्मा भी क्या अनेक होते हैं?
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तभी वहां चींटियों का एक समुदाय दिखाई दिया। उन्हें देखते ही सहसा बटुक को हंसी आ गई। इंद्र को विस्मय हुआ, तो उन्होंने बटुक से कारण पूछा। बटुक ने कहा, देवराज! ये जो चींटियां देख रहे हैं न, वे सब कभी इंद्र के पद पर प्रतिष्ठित रह चुकी हैं।
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बटुक यह कह ही रहे थे कि काला मृगचर्म लिए, तिलक लगाए, चटाई ओढ़े, एक ज्ञानी महात्मा वहां आ पहुंचे। बटुक ने उनसे प्रश्न किया, महात्मन! आप कहां से पधारे हैं? आपका शुभ नाम क्या है? सिर पर आपने चटाई क्यों रखी हुई है और वक्षस्थल पर यह कैसा चक्र है?
मुनि ने कहा, बटुकश्रेष्ठ! आयु का क्या ठिकाना, इसलिए मैंने घर नहीं बनाया। वक्षस्थल के लोमचक्रों के कारण लोग मुझे लोमश कहते हैं। वर्षा और धूप से बचने के लिए मैंने चटाई ओढ़ी है। जब एक इंद्र का पतन होता है, तो मेरा एक रोयां गिर पड़ता है।
यही मेरे उखड़े हुए रोमों का रहस्य भी है। असंख्य ब्रह्मा मर गए और मरेंगे। ऐसी दशा में गृह लेकर मैं क्या करूंगा? भगवान की भक्ति ही सर्वोपरि, सर्वसुखद और दुर्लभ है। यह मोक्ष से भी बढ़कर है। ऐश्वर्य तो भक्ति में रुकावट है। इतना कहकर लोमश वहां से चल दिए।
ब्राह्मण बटुक भी अंतर्धान हो गए। इंद्र को वैराग्य उत्पन्न हुआ और वह वन के लिए चल दिए। बृहस्पति ने उन्हें समझाया कि कोई भी निर्णय सहसा लेना उचित नहीं है।