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महावीर ने क्यों कहा, हथियारों से गहरा घाव देता है यह
शिवकुमार गोयल
Updated Fri, 27 Dec 2013 11:06 AM IST
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तीर्थंकर महावीर ने कहा है, कर्म करने में तो सभी स्वतंत्र हैं, किंतु उसका फल भोगने में परतंत्र। सत्कर्म का सुफल स्वतः मिलता है और दुष्कर्म की सजा प्रत्येक को भोगनी पड़ती है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को विवेक के साथ ही कर्मों की ओर प्रवृत्त होना चाहिए। अशुभ कर्मों से बचते हुए सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलना चाहिए।
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अहिंसा को एक नया आयाम देते हुए भगवान महावीर ने कहा है, वैचारिक हिंसा शारीरिक हिंसा से कम नहीं। अतः व्यक्ति को मन-वचन से भी अहिंसा व्रत का पालन करना चाहिए। यदि किसी को कटु वचन बोला या अपनी आंखें लाल कर क्रोध का प्रदर्शन किया, तो समझ लो कि हिंसा के पाप के भागी बन गए। शारीरिक क्षति पहुंचाने की अपेक्षा कई बार कटु वचन कहीं अधिक गहरा घाव कर देते हैं।
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इसलिए सभी संप्रदायों के धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि वाणी का उपयोग मीठे वचन बोलने में करना चाहिए। किसी से असहमत हैं, तब भी प्रेमपूर्वक अपनी बात कहें। संयम और धैर्य खोकर वाक्युद्ध करनेवालों को भयंकर दुष्परिणाम भुगतने पड़ते हैं।
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स्वभाव से शांत-अहिंसक व्यक्ति भी भावावेश में आकर जब क्रूरता और हिंसा का प्रदर्शन कर बैठता है, तो वह अपने तमाम पुण्यों को खत्म कर डालता है। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, धर्मानुसार किया गया कर्म ही सुपरिणामदायक होता है। मोह माया में अंधे होकर किया गया कर्म विनाशकारी हो जाता है।