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चाणक्य ने कहा, रुपया नहीं इस धन से सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं
शिवकुमार गोयल
Updated Fri, 07 Feb 2014 08:46 AM IST
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एक बार आचार्य चाणक्य से किसी ने पूछा, मानव को स्वर्ग प्राप्ति के लिए क्या उपाय करने चाहिए? चाणक्य ने बताया, जिसकी पत्नी और पुत्र आज्ञाकारी, सद्गुणी तथा अपनी उपलब्ध संपत्ति पर संतोष करते हों, वह स्वर्ग में नहीं, तो और कहां वास करता है।
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आचार्य चाणक्य सत्य, शील और विद्या को लोक-परलोक के कल्याण का साधन बताते हुए नीति वाक्य में लिखते हैं, यदि कोई सत्यरूपी तपस्या से समृद्ध है, तो उसे अन्य तपस्या की क्या आवश्यकता है?
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यदि मन पवित्र है, तो तीर्थाटन करने की क्या आवश्यकता है? यदि कोई उत्तम विद्या से संपन्न है, तो उसे अन्य धन की क्या आवश्यकता है? वह कहते हैं, विद्या, तप, दान, चरित्र एवं धर्म (कर्तव्य) से विहीन व्यक्ति पृथ्वी पर भार है। विद्यया लभते सर्व विद्या सर्वत्र पूज्यते। यानी विद्यारूपी धन से सब कुछ प्राप्त होता है।
आचार्य सदाचार और शुद्ध भावों का महत्व बताते हुए लिखते हैं, भावना से ही शील का निर्माण होता है। शुद्ध भावों से युक्त मनुष्य घर बैठे ही ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। भाव की प्रधानता के कारण ही पत्थर, मिट्टी और लकड़ी से बनी प्रतिमाएं भी देवत्व को प्राप्त करती हैं। अतः भाव की शुद्धता जरूरी है।
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आचार्य चाणक्य का यह भी कहना है कि यदि मुक्ति की इच्छा रखते हो, तो विषय वासना रूपी विद्या को त्याग दो। सहनशीलता, सरलता, दया, पवित्रता और सच्चाई का अमृतपान करो।