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रामकथा सुनाते सुनाते गुरु शिष्य में यह क्या गया

Fri, 11 Apr 2014 09:05 AM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Fri, 11 Apr 2014 09:05 AM IST
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Revered teacher learned

श्रीराम कथा की विशिष्ट काव्य शैली में रचना करनेवाले पंडित राधेश्याम कथावाचक संत-महात्माओं के सत्संग के लिए लालायित रहा करते थे। प्रभुदत्त ब्रह्मचारी की प्रेरणा से उन्होंने महामना पंडित मदनमोहन मालवीय को अपना गुरु बनाया था।

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मालवीय जी के श्रीमुख से भागवत कथा सुनकर पंडित राधेश्याम भाव-विभोर हो उठते थे। मालवीय जी को भी राधेश्याम जी की लिखी रामायण का गायन सुनकर अनूठी तृप्ति मिलती थी।
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एक बार गुरु पूर्णिमा के अवसर पर पंडित राधेश्याम ने संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी के साथ काशी पहुंचकर अपने गुरु मालवीय जी को एक कीमती शॉल व मिठाइयां भेंट कीं। मालवीय जी को आग्रहपूर्वक शॉल ओढ़ाई गई। यह शॉल उन्होंने विशेष रूप से गुरु दक्षिणा के लिए तैयार करवाई थी।

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कुछ समय बाद अचानक हिंदू विश्वविद्यालय के दक्षिण भारतीय संस्कृत शिक्षक मालवीय जी के दर्शन के लिए आ पहुंचे। मालवीय जी उनके विरक्त व तपस्वी जीवन से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने शिक्षक की ओर संकेत कर राधेश्याम कथावाचक से कहा, इन्होंने कठोर साधना कर असंख्य छात्रों को देववाणी और धर्मशास्त्रों का अध्ययन कराया है। ऐसे तपस्वी शिक्षक हमारे आदर्श हैं। यह कहते-कहते उन्होंने वह शॉल उन्हें ओढ़ा दी।

राधेश्याम जी उनकी विरक्ति भावना और आदर्श शिक्षक के प्रति श्रद्धा देख दंग रह गए।

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