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झूठ बोलने की ऐसी सजा सोच भी नहीं सकते आप
यहूदी लोककथा
Updated Tue, 10 Jun 2014 12:33 PM IST
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बाजार में घूमते हुए एक भिखारी को एक बटुआ पड़ा मिला। उसने देखा कि बटुए में सोने की सौ अशर्फियां थीं। तभी उसे एक सौदागर के चिल्लाने की आवाज सुनाई दी। वह कह रहा था, मेरा बटुआ खो गया है। जो कोई उसे खोजकर मुझे देगा, मैं उसे इनाम दूंगा।
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भिखारी ईमानदार निकला। उसने बटुआ सौदागर को लौटाते हुए कहा, यह रहा आपका बटुआ। अब आप मुझे क्या इनाम देंगे? सिक्के गिनते हुए सौदागर का मन बदल गया। उसने भिखारी को दुत्कारते हुए कहा, इस बटुए में तो दो सौ अशर्फियां थीं। तुमने आधी रकम चुरा ली और अब इनाम मांगते हो।
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भाग जाओ यहां से, वरना मैं सिपाहियों को बुला लूंगा। चोरी का मिथ्या आरोप भिखारी से सहन नहीं हुआ। वह बोला, मैंने कुछ नहीं चुराया है। मैंने कोई भी अशर्फी नहीं ली है। अपने आप को सही साबित करने के लिए मैं अदालत जाने के लिए तैयार हूं।
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दोनों अदालत पहुंचे। अदालत में काजी ने दोनों की बातें सुनीं और कहा, मुझे दोनों की बातों पर यकीन है। मैं इंसाफ की बात ही करूंगा। सौदागर, तुम कहते हो कि तुम्हारे बटुए में दो सौ अशर्फियां थीं। लेकिन भिखारी को मिले बटुए में सिर्फ सौ अशर्फियां ही हैं।
इसका मतलब है कि यह बटुआ तुम्हारा नहीं है। चूंकि भिखारी को मिले बटुए का कोई दावेदार नहीं है, इसलिए आधी रकम शहर के खजाने में जमा कर दी जाए और बाकी भिखारी को इनाम में दी जाए।
यह सुनकर सौदागर के पांव तले की जमीन खिसक गई। वह हाथ मलता रह गया। अब वह चाहकर भी अपने बटुए को अपना नहीं कह सकता था, क्योंकि ऐसा करने पर उसे कड़ी सजा हो जाती। इंसाफ-पसंद काजी की वजह से भिखारी को अपनी ईमानदारी का अच्छा इनाम मिल गया।