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महज 1000 रुपये के लिए गांधी जी ने कार्यकर्ता को दी यह कैसी सजा
सेवकराम पांडु
Updated Tue, 06 Oct 2015 12:39 PM IST
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बात 1926 की है। गांधी जी उन दिनों साबरमती में रहते थे। दीनबंधु सी एफ एंड्रूज भी उन दिनों वहीं थे। एक दिन मालाबार की ओर से कांग्रेस कमेटी का मंत्री गांधी जी के पास आया। उसने सार्वजनिक कोष का काफी धन लोकसेवा में खर्च किया था। लेकिन हिसाब-किताब में वह कच्चा था।
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जमा-खर्च का हिसाब वह ठीक से पेश नहीं कर पाया। हजार रुपये का अंतर आ रहा था। स्थानीय कार्यकारिणी का फैसला था, जमा-खर्च पेश करो या फिर पैसे भरो। वह कार्यकर्ता असहाय-सा हो गया। उसने कहा, इतने पैसे कहां से दूं? सदस्य ने भी विवशता बताई, तो उस कार्यकर्ता को महात्मा गांधी की याद आई। उसने सदस्य से कहा, मैं बापू के पास जाता हूं। वह कह देंगे, तब तो मानोगे?
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सदस्य ने हामी भर दी। मंत्री गांधी जी के पास पहुंचा। गांधी जी ने उसकी बात सुनकर कहा, हो सकता है कि तुमने एक भी पैसा खुद के लिए खर्च न किया हो, मगर तुम्हें पैसे भरने चाहिए। सार्वजनिक काम में व्यवस्थित होना बहुत जरूरी है। मंत्री ने कहा, मुझसे भूल हो गई। इसका मुझे पश्चाताप है। लेकिन अब क्या हो? गांधी जी बोले, पैसा भरना ही एकमात्र उपाय है।
यह सुनकर मंत्री रोने लगा। पास ही दीनबंधु खड़े थे। वह बोले, बापू! यह आदमी पश्चाताप कर रहा है। आप उससे इतनी कठोरता से क्यों बोलते हैं? गांधी जी ने कहा, पश्चाताप केवल मन में होने से क्या लाभ? दोष का परिमार्जन हो, तो ही कहा जा सकेगा कि वास्तविक पश्चाताप हुआ। महात्मा गांधी के इस तरह कर्तव्यनिष्ठुर होने पर उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं था। उस कार्यकर्ता ने अपनी नींद में कटौती कर सूत काता और उससे भूल-चूक की भरपाई की।