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मरने से पहले पिता ने दिया बेटे को पत्थर, जौहरी ने बताया बेशकीमती हीरा
संत बालकोबा भावे
Updated Tue, 22 Sep 2015 11:47 AM IST
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सेठ मणिनाथ हीरे का बड़ा व्यापारी था। किसी बीमारी के चलते उसकी अकाल मृत्यु हो गई। वह अपने पीछे पत्नी वसुमति और बेटा अनंत छोड़ गया। बेटा जब बड़ा हुआ, तो उसकी मां वसुमति ने उससे कहा, बेटा, मरने से पहले तुम्हारे पिताजी ये पत्थर छोड़ गए थे। तुम इसे लेकर बाजार जाओ और इसकी कीमत का पता लगाओ। लेकिन याद रहे कि सिर्फ कीमत पता करनी है, इसे बेचना नहीं है।
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अनंत पत्थर लेकर घर से निकला। सबसे पहले उसे एक निर्माणाधीन इमारत में काम करता मजदूर मिला। अनंत ने मजदूर से पूछा, काका इस पत्थर का क्या दोगे? मजदूर ने कहा, बेटा, ऐसे पत्थर तो मैं रोज ढोता हूं। इसका कुछ भी मूल्य नहीं। युवक आगे बढ़ गया। कुछ आगे बढ़ने पर उसे एक सब्जी बेचने वाली महिला मिली। अनंत ने पूछा, अम्मा, तुम इस पत्थर के बदले क्या दे सकती हो? सब्जी वाली बोली, यदि मुझे देना ही है, तो दो गाजरों के बदले ये दे दो। मेरे तौलने के काम आएगा।
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अनंत आगे बढ़ गया। आगे वह एक दुकानदार के पास गया और उससे पत्थर की कीमत जानना चाहा। दुकानदार बोला, इसके बदले मैं अधिक से अधिक 500 रुपये दे सकता हूं। अनंत इस बार एक सुनार के पास गया। सुनार ने पत्थर के बदले 20 हज़ार देने की बात की। फिर वह हीरे की एक नामी दुकान पर गया, उसने पत्थर का निरीक्षण करने के बाद कहा, यह तो एक अमूल्य हीरा है। करोड़ों रुपये देकर भी ऐसा हीरा मिलना मुश्किल है।
अमूल्य ज्ञान के साथ भी ऐसा ही है। न समझने वाले, या पहले से ही मिथ्याज्ञान से भरे व्यक्ति के लिए उसका मूल्य कुछ नहीं। वह तो वहीं अपना पूरा मूल्य पाता है, जहां विवेक और परख सम्यक रूप से मौजूद हों।