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मरते समय पिता ने दिए सोने के सिक्के पर बेटे ने उन्हें फेंक दिया

Mon, 15 Dec 2014 03:23 PM IST
ओशो
ओशो Updated Mon, 15 Dec 2014 03:23 PM IST
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rajneesh osho article.

दहर नाम का वह भिक्षु बुद्ध के संघ में बचपन से था। उसका पिता मरते समय अपने बेटे को देखना चाहता था, लेकिन दहर बाहर गया था। इसलिए पिता उसे देख नहीं पाया। नाम लेकर रोते-रोते ही वह मरा।

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मरने से पहले उसने छोटे बेटे को सौ स्वर्णमुद्राएं दीं और कहा कि जब दहर आए, तो उसे दे देना। कुछ दिन बाद दहर लौटा, तो उसके छोटे भाई ने सारी बात बताई और मुद्राएं दे दी।
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लेकिन दहर ने वे मुद्राएं फेंक दीं, क्योंकि नियम के अनुसार भिक्षु को कामिनी और कांचन से दूर रहना चाहिए। दहर ने अपने भाई से कहा कि तू भी मुझे भ्रष्ट करना चाहता है? देखता नहीं कि मैं भिक्षु हूं। इस त्याग से दहर में अहंकार पैदा हो गया।
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कुछ दिनों तक तो वह अन्य भिक्षुओं से इस त्याग की घमंडपूर्वक चर्चा करता रहा। लेकिन कुछ दिनों बाद वह उदास रहने लगा। फिर उसे अपनी स्थिति पर ग्लानि होने लगी। दिनोंदिन उसकी उदासी बढ़ने लगी। एक रात इस ग्लानि ने इतनी तीव्रता से उसे पकड़ लिया कि उसने सुबह बुद्ध से क्षमा मांगकर भिक्षु से वापस गृहस्थ बनने का निश्चय कर लिया।

लेकिन सुबह होते ही उसे पता नहीं, क्या हुआ कि उसने यह निश्चय स्थगित कर दिया। लेकिन वह स्वर्णमुद्राओं और उनके भंडार से मिलने वाले सुख-ऐश्वर्य के बारे में और भी ज्यादा चर्चा करने लगा। उसकी चर्चा का असर दूसरे भिक्षुओं पर भी होने लगा। आखिर भिक्षुओं ने दहर के बारे में बुद्ध को बताया।

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बुद्ध ने कहा कि यह तो होना ही था। धन के त्याग में जो प्रशंसा लेना चाहता है, वह धन में अपने रस की घोषणा करता है। पर उन्होंने दहर से कुछ न कहा। एक दिन उन्होंने दहर को अचानक बुलाया और कहा कि वापस जाना चाहते हो, तो जाओ। पर इतनी-सी स्वर्णमुद्राओं से भी क्या होगा! सौ स्वर्णमुद्राएं कितने दिन चलेंगी? इन सौ स्वर्णमुद्राओं से क्या तुम्हारी तृष्णा पूरी हो जाएगी? मेरी तरफ देखो, बुद्ध ने कहा, मेरे पास तो अरबों-खरबों स्वर्णमुद्राएं थीं।


बुद्ध इतना कहकर मौन हो गए और दहर को बोध होने लगा कि बुद्ध कह रहे हैं, मेरे पास तो बहुत था, पर मुझे लगा कि उतने से भी भरेगा नहीं मन। तो तू सौ स्वर्णमुद्राओं से भर लेगा!

यह तेरे मन की प्यास इतनी बड़ी है और यह तू सौ बूंदों से भर लेगा! सागर छोड़कर मैं आ रहा हूं, मैं तुझसे कहता हूं कि सागर से भी नहीं भरती यह प्यास। यह भरती ही नहीं, क्योंकि मन में कोई पेंदी नहीं है। कितना ही डालते चले जाओ, सब गिरता चला जाता है। मन खाली का खाली रहता है। ऐसा जानकर ही सुधीजन देवलोकों के भोगों में भी मन नहीं रमाते।’

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