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धोबी के बेटे के अफसर बनने की कहानी रुला देगी आपको
प्रकाश राव
Updated Wed, 22 Jul 2015 06:24 PM IST
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अनंतमूर्ति नाम के युवक ने किसी बड़ी कंपनी में आवेदन किया। आवेदन किसी वरिष्ठ पद के लिए था। शुरुआती परीक्षाएं और इंटरव्यू पास कर लेने के बाद उसे फाइनल इंटरव्यू के लिए कंपनी के निदेशक के पास भेजा गया। निदेशक ने उसके शैक्षणिक रिकॉर्ड देखे, और पूछा, क्या तुम्हें स्कूल-कॉलेज में छात्रवृत्ति मिलती थी?
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अनंतमूर्ति ने 'नहीं' कहा और यह भी बताया कि उसकी फीस माता-पिता भरते थे, जो कपड़ों की धुलाई का कार्य करते हैं। निदेशक ने उससे अपने हाथ दिखाने के लिए कहा। अनंतमूर्ति के हाथ बहुत मुलायम थे। निदेशक ने उससे पूछा, तुमने कभी माता-पिता की उनके कार्यों में मदद की है?
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अनंतमूर्ति ने फिर 'नहीं' कहा, क्योंकि उसके माता-पिता यही चाहते थे कि वह केवल पढ़ाई पर ध्यान दे। निदेशक ने उससे कहा, आज जब तुम घर जाओ, तो अपने माता-पिता के हाथ साफ करो और कल मुझसे फिर मिलो।
अनंतमूर्ति जब अपने घर पहुंचा, तो उसने माता-पिता से कहा कि वह उनके हाथ धोना चाहता है। जब वह उनके हाथ साफ करने लगा, तो उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसके माता-पिता के हाथ कठोर काम करने से रूखे और जख्मी हो गए हैं। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। उसे महसूस हुआ कि उसे पढ़ा-लिखाकर काबिल बनाने के लिए उसके माता-पिता इस उम्र तक कितनी कड़ी मेहनत करते रहे हैं।
अगले दिन निदेशक ने अनंतमूर्ति से उसका अनुभव पूछा। उसने कहा, मैंने उनके हाथ धोए और धुलाई का बचा हुआ काम भी निपटाया। अब मैं जान गया हूं कि उनकी करुणा का मूल्य क्या है। यदि वे यह सब न करते, तो मैं आज आपके सामने नहीं बैठा होता। यह सुनकर निदेशक काफी खुश हुए।