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इनसे बचें, ये आदतें आपकों भी कर सकती हैं दुखी!

Tue, 29 Apr 2014 03:38 PM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Tue, 29 Apr 2014 03:38 PM IST
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Philanthropy is divine worship

देह का तभी तक महत्व है, जब तक उसमें आत्मा रूपी देव बसता हो। देह में बैठे देव के दर्शन के आकांक्षी को देह को मंदिर की तरह पवित्र रखने का अभ्यास करना चाहिए।

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महान विरक्त संत रामचंद्र डोंगरे महाराज एक कथा सुनाया करते थे कि एक बार प्रभु ने देव और ऋषियों से पूछा, क्या आप दुनिया को सुखी रखेंगे? देव और ऋषियों ने कहा, प्रभु, आपकी दुनिया का जो होना है हो, हम तो अपने कल्याण के कार्यों में ही व्यस्त रहेंगे। प्रभु को यह सुनकर लगा कि भला यह क्या बात है। जिस देश और समाज में जन्म हुआ, उसके लिए ये तनिक भी विचार करने को तैयार नहीं।
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तब उन्हें लगा कि मानव ही अपने कर्तव्य पालन से संसार को सुखी रख सकेगा। प्रभु ने धर्मशास्त्रों के सूत्र बताते हुए कहा, तुमको सुखी होना है, तो दूसरों को सुख और संतोष दो। किसी को दुखी करनेवाला स्वयं भयंकर दुखों में घिर जाता है।
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संत डोंगरे जी ने कहा, यदि मानव दुखी, असहाय और बीमार व्यक्ति में ईश्वर के दर्शन करके उसे सुखी बनाने का प्रयास करे, तो उसे अनूठी शांति मिलेगी। प्यासे को पानी, भूखे को अन्न और रोगी को दवा देकर सेवा करने वाले असल में प्रभु की ही पूजा करते हैं।


जिसकी आंखें देह में रहते हुए देव को देख सकती हैं, वही परोपकार कर सकता है। परोपकार परमात्मा की पूजा है। जो देह में देव को देख सकता है, वही देव की पूजा भी कर सकता है।

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