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किसी को कटा फटा नोट या खोटा सिक्का देकर निकल जाते हैं तो इस बात पर ध्यान दें
-वाजिद अली
Updated Mon, 11 Jan 2016 03:26 PM IST
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शेख उस्मान ख्याति प्राप्त विद्वान थे। उन्होंने अपने उस्ताद निजामुद्दीन औलिया के सान्निध्य में आध्यात्मिक गुणों का विकास किया था। शेख उस्मान का धर्मग्रंथों पर अच्छा अधिकार था। मानव की सेवा ही उनके जीवन का प्रमुख अंग था। शेख उस्मान नहीं चाहते थे कि समाज से रोटी, कपड़ा मुफ्त प्राप्त किया जाए।
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इसलिए वह सुबह-शाम एक-एक घंटे के लिए सड़क किनारे अपनी छोटी-सी दुकान लगाकर बैठ जाते और शलगम, चुकंदर, आलू आदि की सब्जी बेचते। जो कुछ पैसा मिलता, उसमें उनके परिवार का पालन-पोषण हो जाता।
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यदि कोई व्यक्ति उन्हें खोटा सिक्का दे जाता, तो भी वह उसे जान-बूझकर रख लेते और बदले में सब्जी दे देते। वह अच्छी तरह जानते थे कि यदि किसी के पास एक भी खोटा सिक्का आ जाता है, तो उसे वह किसी दूसरे को दे देना चाहता है। इस तरह एक व्यक्ति दूसरे को और दूसरा तीसरे को देकर आगे बढ़ जाता है। शेख उस्मान के पास पहुंच कर खोटा सिक्का आगे न बढ़ता। वह उसे अपने पास रख लेते।
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इससे लोगों में यह धारणा बन गई थी कि शेख को खोटे-खरे सिक्के की परख नहीं है। परिणामस्वरूप अनेक व्यक्ति खोटा सिक्का लेकर आते और बदले में अच्छा सिक्का ले जाते या छुट्टे कराकर उसके पैसे ले जाते।
शेख का जीवन समाप्त होने को आया। आखिरी दिन खुदा को याद करते हुए वह बोले-परवरदिगार! तुझसे मेरी स्थिति छिपी नहीं है। लोग मेरे पास खोटे सिक्के लेकर आते थे, मैं बदले में उन्हें सब्जी देता था। किसी का खोटा सिक्का मैंने वापस नहीं किया। तेरे इस नाचीज बंदे से भी कितने ही खरे बंदे होंगे। उनमें मुझ जैसा एक खोटा बंदा भी कहीं पड़ा रहेगा। मेरे मालिक, मुझ पर रहम करना।