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यकीन मानिए, चाय के शौकीनों के लिए इससे अच्छी बात नहीं हो सकती
फादर एंथोनी डी'मेलो
Updated Thu, 16 Jul 2015 12:20 PM IST
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जापान में कुलीन व्यक्तियों का एक समूह था, जिसके सदस्य साथ बैठकर सबसे अच्छी चाय पीते और हंसी-मजाक करते। साथ ही वे देश और समाज की स्थितियों तथा समस्याओं पर भी बातचीत करते। असल में, वे समय व्यतीत करने के लिए ही मिलते। यह बैठक तभी होती, जब उस समय की दुर्लभ और बेशकीमती चाय मिल जाती।
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कहना कठिन है कि बैठक समस्याओं पर वार्तालाप के लिए होती, या अनूठी चाय पीने के लिए। उस समूह के सदस्य हमेशा महंगी-से-महंगी और अपने स्वाद से लुभा लेनेवाली जायकेदार चाय की खोज में लगे रहते थे।
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जब किसी नए किस्म की चाय नहीं मिल पाती, तो समूह के सबसे बुजुर्ग सदस्य का यह दायित्व होता कि वह बैठक और आतिथ्य का इंतजाम करे। एक बार इसी तरह सभी सदस्यों को चाय पिलाने की बारी एक बुजुर्ग पर आई। परंपरा के अनुसार बड़े सलीके से चाय पिलाने का प्रबंध किया गया।
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उस बुजुर्ग ने स्वर्ण पात्र से चाय निकालकर सभी को परोसी। वहां उपस्थित सभी जन चाय के अप्रतिम जायके से अभिभूत थे और उन्होंने बुजुर्ग से पूछा कि उन्हें ऐसी अद्भुत चाय कहां से मिली।
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बुजुर्ग ने मुस्कराते हुए कहा, मेरे फार्म के मजदूर से। यह सुनकर वहां मौजूद सभी सदस्य हैरान रह गए। उन्होंने कहा, उस मजदूर से पूछना चाहिए कि उसे ऐसी चाय कहां से मिली। यह सुनकर मेजबान सदस्य ने कहा, जिस चाय को पीकर सभी इतने आनंदित हो रहे हैं, फार्म के मजदूर तो रोज ही अपने घर में इस तरह की चाय पीते हैं।
फिर कुछ रुककर वह बोला, जीवन में जो कुछ भी अच्छा है, वह सर्वसुलभ है। उसे पाने के लिए कुछ खर्च नहीं करना पड़ता। जैसे हवा, पानी, आग, धरती, फूल और चारों तरफ छाया हुआ आकाश।