अचानक नहीं आई, गांधी जी को पहले से पता था आने वाली है मौत

टीम डिजिटल/ अमर उजाला, दिल्ली Updated Thu, 30 Jan 2014 08:57 AM IST
mahatma gandhi death
कहते हैं मृत्यु बताकर नहीं आती। यह दबे पांव आकर व्यक्ति को अपने साथ लेकर चली जाती है। लेकिन कुछ दिव्य आत्मा ऐसी होती है जो मृत्यु की आहट पहचान लेती है और समझ जाते हैं कि उनकी मौत अब करीब आ चुकी है। ऐसे ही महान आत्मा थे महात्मा गांधी।

चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय (मेरठ) के इतिहास विभाग की पूर्व अध्यक्ष एवं गांधी अध्ययन संस्थान की पूर्व निदेशक गीता श्रीवास्तव ने एक शोध में बताया है कि गांधी जो को अपनी मृत्यु का पूर्वाभास हो चुका था। इसका गांधी जी ने अपने जीवन में कई बार उल्लेख भी किया था।

शोध में बताय गया है कि, गांधीजी ने अपनी मृत्यु से चंद मिनट पहले यानी अपनी अंतिम प्रार्थना सभा के दौरान काठियावाड़ (गुजरात) से उनसे मिलने दिल्ली आए दो नेताओं को कहलवाया था, यदि मैं जीवित रहा तो प्रार्थना सभा के बाद आप लोग मुझसे बात कर सकेंगे।

इस प्रकार मृत्यु से पहले गांधी जी ने पूर्वाभास की सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्ति कर दी थी। डॉ. श्रीवास्तव ने अपने शोध और कृष्णा कृपलानी द्वारा 1968 में लिखित पुस्तक 'नेशनल बायोग्राफी गांधी: ए लाइफ में लिखा है।

इस पुस्तक में ऐसे कई तथ्यों को उजागर करने की कोशिश की गई है, जो अन्यत्र प्रकाश में नहीं आ सके थे। डॉ. श्रीवास्तव का कहना है कि गांधीजी उन भाग्यशाली महापुरुषों में माने जाएंगे, जो अपनी इच्छानुसार मृत्यु को प्राप्त हुए। उन्होंने कहा कि मृत्यु के समय गांधीजी की जुबान पर 'हे राम शब्द थे। उनके निकट सहयोगी जानते थे कि यही उनके जीवन की सबसे बड़ी इच्छा भी थी।

इससे पहले 20 जनवरी 1948 को प्रार्थना सभा से पूर्व चारों ओर लोगों से घिरे गांधीजी से चन्द गज की दूरी पर हुए बम विस्फोट ने उन्हें जरा भी विचलित नहीं किया था और उन्होंने अपना संबोधन जारी रखा था। गांधीजी ने कभी अपनी सुरक्षा को पसन्द नहीं किया।

यहां तक कि अपनी मृत्यु से चालीस वर्ष पूर्व 1908 में जब उनके जीवन को जोहान्सबर्ग (दक्षिण अफ्रीका) के एक गुस्सैल पठान मीर आलम से खतरा बना हुआ था, तो भी उन्होंने सहज भाव से कहा था- किसी बीमारी या किसी दूसरी तरह से मरने के नहीं हो सकता और यदि मैं ऐसी स्थिति में अपने हमारे के प्रति गुस्सा या घृणा से स्वयं को मुक्त रख सकूं, तो मैं जानता हूं कि यह मेरे शाश्वत कल्याण को बढ़ाने वाला होगा।

संभवत: गांधीजी की शहीद होने की अर्धचेतन मन की आंतरिक इच्छा थी, जो कभी मुखर होकर व्यक्त हो जाती है थी और उनकी कल्पना को ग्रसित कर लेती थी। बम विस्फोट से वह और दृढ़ हो गई थी। 20 जनवरी 1948 के बाद अपनी पौत्री मनु से उन्होंने कई बार 'हत्यारे की गोलियां या 'गोलियों की बौछार के बारे में बातें की थीं, जो बुराई की आशंका में नहीं वरना अपने सार्थक जीवन के अन्त के रूप में थी, जिसका आभास उन्हें हो चुका था।

अपनी मृत्यु से एक दिन पहले 29 जनवरी को उन्होंने मनु से कहा था, यदि मेरी मृत्यु किसी बीमारी से, चाहे वह एक मुंहासे से ही क्यों न हो, तुम घर की छत से चिल्ला-चिल्लाकर दुनिया से कहना मैं एक झूठा महात्मा था। यहां तक कि ऐसा कहने पर लोग तुम्हें कसम खाने को कह सकते हैं।

तब मेरी आत्मा को शांति मिलेगी। दूसरी तरफ यदि कोई मुझे गोली मारे, जैसा कि उस दिन किसी ने मुझ पर बम फेंकने की कोशिश की थी और मैं उस गोली को अपने खुले सीने पर बिना पीड़ा से कराहे ले लूं और मेरी जुबान पर राम का नाम हो, तभी तुम्हें कहना चाहिए कि मैं एक सच्चा महात्मा था।

अंत में 30 जनवरी 1948 को वह घड़ी भी आ पहुंची, जब गांधीजी का पूर्वाभास सच होने वाला था। अपनी पौत्रियों मनु और आभा का सहारा लेकर वह प्रतिदिन होने वाली प्रार्थना सभा में पहुंचे। अभी उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर लोगों को अभिवादन स्वीकार ही किया था कि एक नवयुवक ने मनु को झटका देकर और गांधीजी के आगे घुटनों के बल अभिवादन के अन्दाज में झुककर तीन गोलियां दाग दीं।

दो गोलियां तो सीधी तरफ से निकल गईं, लेकिन तीसरी उनके फेफड़े में जा फंसी। गांधीजी, वहीं गिर गए। पीड़ा से कराहे बगैर ही उनकी जुबान पर 'हे राम शब्द थे...और इस तरह गांधीजी ने अपनी इच्छानुसार मृत्यु को प्राप्त होकर एक सच्चा महात्मा होना अन्तत: सिद्ध कर ही दिया।

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