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रूपवती पत्नी के व्याभिचार का इस तरह हुआ पर्दाफाश
योगी यतींद्र दास
Updated Wed, 17 Dec 2014 03:12 PM IST
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राजा भर्तृहरि पिंगला नाम की अति सुंदर राजकुमारी पर मुग्ध थे। उन्होंने पिंगला से विवाह किया और उसे तीसरी पत्नी बनाया। रूप-रंग पर आसक्त राजा के रागरंग भरे जीवन का लाभ उठाकर पिंगला व्याभिचारिणी हो गई। वह घुड़साल के रखवाले से प्रेम करने लगी। भर्तृहरि के छोटे भाई विक्रमादित्य को यह बात मालूम हुई, तो उन्होंने अपने भाई को सतर्क किया। राजा ने इस पर कुपित होकर विक्रमादित्य को ही प्रताड़ित कर राज्य से निकाल दिया।
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वर्षों बाद एक तपस्वी ने देवताओं से वरदान में मिला अमर फल (जिसे खाने वाला अमर हो जाता है) राजा भर्तृहरि को भेंट किया। राजा ने वह फल पिंगला को दे दिया, ताकि मृत्यु उसके पास न फटक सके। पिंगला ने वह फल अपने प्रेमी को दे दिया, जो घुड़साल का रखवाला था।
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रखवाले ने वह फल उस वेश्या को दे दिया, जिससे वह प्रेम करता था। वेश्या ने सोचा कि इस अमर फल को खाने से तो वह अनंतकाल तक पाप कर्म में डूबी रहेगी। इसलिए इस फल का सच्चा अधिकारी राजा है। अगर यह फल राजा को भेंट कर दिया जाए, तो देश के लिए अच्छा रहेगा। राजा अधिक समय तक सुखपूर्वक जी सकेंगे और प्रजा हमेशा सुखी रहेगी।
वह वेश्या राजा को अमर फल देने गई। पिंगला को दिए उस फल को वेश्या के पास देख भर्तृहरि स्तब्ध रह गए। उन्हें अपने भाई की बातें और पिंगला का विश्वासघात समझ में आ गया। उन्हें बोध हुआ कि विलासिता में डूबा व्यक्ति एक-दूसरे से छल और धोखा ही करता है। इसके बाद भर्तृहरि अपना राजपाट विक्रमादित्य को सौंपकर शांति पाने के लिए वन में चले गए।