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क्या हुआ जब धरती पर परिवार बसाकर रहने लगे वराह भगवान
स्वामी विवेकानंद
Updated Thu, 08 Oct 2015 03:54 PM IST
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हिरण्याक्ष का वध करने और धरती को वापस समुद्र से बाहर निकाल लेने के बाद भी भगवान वाराह अपने लोक वापस नहीं लौटे, तो स्वयं लक्ष्मी, देवताओं और पार्षदों को चिंता होने लगी। किसी की समझ में नहीं आया कि वाराह कहां गए।
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व्याकुल देवताओं ने शंकर जी से अनुरोध किया कि उन्हें तलाश करें। शंकर जी ने हर जगह खोजा, पर वह कहीं नहीं मिले। वह उन्हें दोबारा ढूंढने लगे। इस बार उन्होंने उन्हें सभी लोकों में तलाशा। जब भूलोक में उन्होंने देखा, तो पाया कि वहां वह अपना परिवार बनाए बैठे हैं। स्वजनों के साथ क्रीड़ा कल्लोल में संलग्न हैं।
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शिवशंकर ने उनसे वापस ब्रह्मलोक चलने की प्रार्थना की। वाराह ने नहीं माना और कहा, मैं यहीं मजे से हूं। शिव ने कहा, आपके बिना तीनों लोकों में हाहाकार मचा हुआ है। वाराह ने इस बारे में कुछ भी कहने-सुनने से इन्कार कर दिया और अपना क्रीड़ा-विनोद छोड़ने को तैयार न हुए।
बहुत समझाने के बाद भी वाराह नहीं माने, तो शंकर क्रुद्ध हो गए। उन्होंने त्रिशूल से वाराह का पेट फाड़ डाला। उनका शरीर क्षत-विक्षत हो गया, तो विवश होकर वाराह भगवान अपने लोक जा पहुंचे।
प्रतीक्षा में चिंतित बैठे देवताओं ने जब उनसे विलंब का कारण पूछा तो उन्होंने कहा, शरीर और उसकी ममता बड़ी प्रबल है। जीवधारी उसी में लिप्त होकर लक्ष्य को भूल जाते हैं। सुख-साधनों के छूटे बिना उस माया से छुटकारा नहीं मिलता। अन्य शरीरधारियों की तरह मेरी भी दुर्गति हुई। शंकर जी ने उस माया को विदीर्ण न किया होता, तो मेरे लिए भी वापस लौटना कठिन था।
यह सुनकर शिवजी हंस पड़े। उन्होंने कहा, आसक्ति के बंधनों में बंधे हुए जीव अगर त्याग न करें, तो उनका छुटकारा संभव नहीं। आसक्ति ग्रस्त वाराह जी की जब यह दुर्गति हुई, तो दूसरों के बारे में कहना ही क्या?