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पराजित होने के बाद इस राजा ने उठाए थे चौंकाने वाले कदम
जानकीनाथ शर्मा
Updated Wed, 21 Oct 2015 12:50 PM IST
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कोसल के राजा का नाम चारों ओर फैला था। वह गरीबों के रक्षक और प्रजापालक थे। काशीपति ने जब उनकी कीर्ति सुनी, तब वह जल-भुन गए। झट उन्होंने एक बड़ी सेना ली और कोसल पर चढ़ आए। युद्ध में कोसलनरेश की हार हुई और वह वन भाग गए। कोसलनरेश की पराजय से वहां की प्रजा दिन-रात रोने लगी।
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काशीराज ने सोचा कि प्रजा की मदद लेकर कोसलनरेश कहीं फिर विद्रोह न कर बैठें, इसलिए उन्होंने घोषणा करा दी कि जो कोसलपति को ढूंढ लाएगा, उसे सौ मोहरें दी जाएंगी। चूंकि प्रजा में कोसलनरेश का सम्मान था, इसलिए जिसने भी यह घोषणा सुनी, आंख-कान बंदकर जीभ दबा ली।
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इधर कोसलनरेश दीन-मलीन होकर जंगल में भटक रहे थे। एक दिन एक पथिक उनके सामने आया और पूछने लगा, वनवासी, इस वन का कहां जाकर अंत होता है, और कोसलपुर जाने का मार्ग कौन-सा है? राजा ने पूछा, तुम्हारे वहां जाने का कारण क्या है?
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पथिक बोला, मैं व्यापारी हूं। मेरी नौका डूब गई है। अब द्वार-द्वार कहां भीख मांगता फिरूं। सुना था कि कोसल का राजा बड़ा उदार है। इसलिए उसी के दरवाजे जा रहा हूं। थोड़ी देर तक सोचने के बाद राजा ने कहा, चलो तुम्हें पहुंचा ही आऊं।
काशीराज की सभा में एक जटाधारी व्यक्ति आया। काशीनरेश ने पूछा, कहिये, किस लिए पधारे? जटाधारी ने कहा, मैं कोसलराज हूं। तुमने मुझे पकड़कर लाने वाले को सौ स्वर्ण मुद्राएं देन की घोषणा कराई थी। मेरे साथी को वह धन दे दो।
सारी सभा सन्न हो गई। व्यापारी की आंखों में आंसू आ गए। काशीपति सारी बातें सुनकर स्तब्ध रह गए। क्षण भर के बाद उन्होंने कहा, मैं अपना हृदय प्रदान करता हूं, और आपका राज्य भी। यह कहते हुए उन्होंने झट कोसलराज को सिंहासन पर बिठा दिया। सारी सभा धन्य-धन्य कह उठी।