{"_id":"c1cfd4aad4284f99ebb27d026bf6702c","slug":"kabir-thought-about-saint","type":"story","status":"publish","title_hn":"आसाराम जैसे साधु संत के बारे में क्या कहा है कबीर दास ने","category":{"title":"Metaphysical","title_hn":"परामनोविज्ञान","slug":"metaphysical-parasychology"}}
आसाराम जैसे साधु संत के बारे में क्या कहा है कबीर दास ने
शिवकुमार गोयल
Updated Tue, 21 Jan 2014 12:26 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
संत कबीरदास धर्म के नाम पर पाखंड करने वालों से बचकर रहने की प्रेरणा दिया करते थे। काशी के गंगातट पर वे किसी साधु वेशधारी को नशा करते या अमर्यादित आचरण करते देखते, तो उसे इन पाप कर्मों से बचने का सुझाव देते थे। एक बार किसी श्रद्धालु ने कबीर से पूछा, साधु के लक्षण क्या होते हैं?
विज्ञापन
उन्होंने तपाक से कहा, साधु सोई जानिए, चले साधु की चाल। परमारथ राता रहे, बोलै बचन रसाल। यानी संत उसी को जानो, जिसका आचरण संत की तरह शुद्ध हो, जो परमार्थ में लगा हो और सबसे मीठे वचन बोलता हो।
विज्ञापन
कबीरदास ने अपनी साखी में लिखा, संत उन्हीं को जानो, जिन्होंने आशा, मोह, माया, मान, हर्ष, शोक और परनिंदा का त्याग कर दिया हो। सच्चे संतजन अपने मान-अपमान पर ध्यान नहीं देते।
विज्ञापन
दूसरे से प्रेम करते हैं। उनका मानना था कि यदि साधु एक ही जगह रहने लगेगा, तो वह मोह-माया से बच नहीं सकता। इसलिए उन्होंने लिखा, बहता पानी निरमला-बंदा गंदा होय। साधुजन रमता भला-दाग न लागै कोय।
संत कबीरदास जानते थे कि ऐसा समय आएगा, जब सच्चे संतों की बात न मानकर लोग दुर्व्यसनियों की पूजा करेंगे। इसलिए उन्होंने लिखा था, यह कलियुग आयो अबै, साधु न मानै कोय। कामी, क्रोधी, मसखरा, तिनकी पूजा होय।
आज कबीर की वाणी सच्ची साबित हो रही है तथा संत वेशधारी अनेक बाबा घृणित आरोपों में घिरे हैं।