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क्यों क्रोधित हो गए इंद्र जब ऋषि ने कहा यह मैं नहीं दे सकता
शिवकुमार गोयल
Updated Wed, 12 Feb 2014 08:33 AM IST
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सतयुग में महर्षि दध्यंग आथर्वण अग्रणी ब्रह्मवेत्ता के रूप में विख्यात थे। देव शिरोमणि इंद्र उनकी ख्याति सुनकर एक दिन उनके पास पहुंचे। इंद्र ने कहा, महर्षि, मेरी मनोकामना पूर्ण करने के लिए मुझे वरदान देने का वचन दें। महर्षि ने वचन देकर उनसे बैठने को कहा।
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महर्षि ने पूछा, अतिथिवर, आप अपना परिचय दें। इंद्र ने बताया, मैं देवराज इंद्र हूं। स्वर्ग से आपके पास ब्रह्मविद्या प्राप्त करने आया हूं।
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महर्षि यह सुनते ही चिंतातुर हो उठे। वह जानते थे कि विद्या दान सुपात्र को किया जाना चाहिए। कुपात्र को दी गई विद्या का परिणाम राष्ट्र व समाज के लिए अहितकर होता है। इंद्र स्वर्ग के भोगों के लोलुप हैं, इसलिए वह ब्रह्मविद्या नहीं प्राप्त कर सकते।
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कुछ देर चिंतन करने के बाद उन्होंने युक्ति से काम लेने की सोची। इंद्र को उपदेश देते हुए उन्होंने कहा, देवराज, भोगों में आसक्ति कभी कल्याणकारी नहीं हो सकती। परम तत्व की प्राप्ति के लिए मन की निर्मलता, भोगों के प्रति विरक्तता आवश्यक है। यदि योग का आश्रय लेना है, तो सबसे पहले भोग की लालसा पर विजय पाना जरूरी है।
इंद्र समझ गए कि महर्षि उन्हें ब्रह्मविद्या नहीं देंगे। इसलिए विदा लेते हुए क्रोध में कहा, मुनिवर, यदि इस रहस्यमय विद्या को आपने अन्य किसी को दिया, तो मेरा कोपभाजन आपको बनना पड़ेगा। फिर भी क्रोधित न होकर महर्षि ने इंद्र को ससम्मान विदा किया।