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बस यह एक चीज आत्मा परमात्मा को समझने नहीं देती
शिवकुमार गोयल
Updated Fri, 04 Apr 2014 09:28 AM IST
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भारतीय संस्कृति मानवता और सहिष्णुता का संदेश देती रही है। कहा गया है, एक सत् विप्रा बहुधा वदन्ति अर्थात उपासना के सभी मार्ग अंततः चरम सत्य तक ही पहुंचाते हैं। आयरलैंड में जन्मी मार्गरेट नोबल नामक युवती ने स्वामी विवेकानंद के उपदेशों से प्रभावित होकर अपना सर्वस्व भारत व भारतीय संस्कृति की सेवा के लिए समर्पित कर दिया था।
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स्वामी विवेकानंद से दीक्षा लेकर वह भगिनी निवेदिता बन गईं। एक दिन उन्हें वेदों और गीता के महत्व पर प्रवचन देते देखकर एक अंग्रेज ने कहा, अपने ईसाई धर्म की जगह तुम भारतीय धर्म में क्या विशेषता देखती हो?
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भगिनी निवेदिता ने विनम्रता से कहा, मुझे भारतीय धर्मशास्त्रों के इस सार ने प्रभावित किया है कि सत्य रूपी धर्म का साक्षात्कार किसी भी उपासना पद्धति के माध्यम से किया जा सकता है। आत्म साक्षात्कार किसी भी धर्म, पंथ या जाति के व्यक्ति का मौलिक अधिकार है।
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निवेदिता ने लिखा है, सत्य का साक्षात्कार केवल हमारे मार्ग से ही होगा, ऐसा समझना अहंकार होगा। जिस प्रकार नदियां विभिन्न स्थानों से निकलते हुए सागर में पहुंचती हैं, उसी प्रकार विभिन्न पूजा-उपासना पद्धतियां भी ईश्वर और सत्य तक ले जाती हैं। इसलिए किसी व्यक्ति को असहिष्णु होकर अपने ही धार्मिक मार्ग पर चलने का दुराग्रह नहीं करना चाहिए। यह दुराग्रह ही आत्मा-परमात्मा का रहस्य समझने में बाधक बनता है।