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स्वामी दयानंद सरस्वती ने सभा में यह क्या कह दिया?

Tue, 25 Feb 2014 11:03 AM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Tue, 25 Feb 2014 11:03 AM IST
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Holds true even in difficult times

आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती वेदों के इस वाक्य को अपने उपदेश में दोहराया करते थे कि सत्य पर अटल रहना चाहिए। प्राण भी चले जाएं, किंतु सत्य का त्याग नहीं करना चाहिए।

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वह केवल वाणी से ही सत्य के महत्व को प्रस्तुत नहीं करते थे, बल्कि स्वयं उसका सदैव दृढ़ता से पालन किया करते थे।

स्वामी जी प्रवचन में स्वदेश प्रेम, राष्ट्रभाषा हिंदी को अपनाने, स्वदेशी वस्तुओं का इस्तेमाल कर कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने की प्रेरणा दिया करते थे।

एक बार स्वामी जी किसी सभा में जाने वाले थे। उनके एक भक्त ने कहा, वहां अंग्रेज गवर्नर और कलेक्टर होंगे। ऐसी स्थिति में प्रवचन में कोई ऐसी बात नहीं कहिएगा, जिससे किसी को बुरा लगे।
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स्वामी जी समारोह में पहुंचे। प्रवचन शुरू करते ही वह बोले, लोग कहते हैं कि सत्य को प्रकट न करो, कलेक्टर-कमिश्नर-गवर्नर आदि को बुरा लगेगा। वे क्रोधित होंगे, पर चक्रवर्ती राजा भी क्यों न अप्रसन्न हों, हम तो सत्य ही कहेंगे।
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उन्होंने गीता का उद्धरण देते हुए आगे कहा, आत्मा को न तो कोई हथियार छेद सकता है और न ही आग जला सकती है। यह शरीर तो अनित्य है।

इसकी रक्षा के लिए अधर्म करना व्यर्थ है। क्या कोई यह दावा कर सकता है कि वह मेरी आत्मा का नाश कर देगा? शरीर रक्षा के लोभ में मैं सत्य को क्यों दबाऊं? स्वामी जी की निर्भीक वाणी सुनकर सभी हतप्रभ रह गए।

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