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दिल्ली के इस 'भूत बंगले' की पूरी कहानी जानिए

Wed, 22 Jul 2015 05:09 PM IST
Updated Wed, 22 Jul 2015 05:09 PM IST
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haunted bungalow delhi
शामनाथ मार्ग का बंगला नंबर 33 पहली नज़र में ही आलीशान नज़र आता है। 5500 वर्गमीटर में फैले दो मंज़िला बंगले में तीन बेडरूम, ड्राइंग रूम, डाइनिंग हॉल और कांफ्रेंस रूम हैं।
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बंगले में गॉर्ड के लिए अलग कमरा है और नौकरों-चाकरों के लिए अलग से 10 क्वार्टर हैं। बंगले के चारों तरफ़ एक बड़ा सा लॉन है। बग़ीचे में पानी का फव्वारा है।

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राजधानी दिल्ली के पॉश इलाक़े के इस बंगले की कीमत करोड़ों में होगी। लेकिन ये सरकारी बंगला मनहूस माना जाता है और पिछले 10 साल से इसमें रहने वाला कोई नहीं था।
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लोग तब यहाँ रहने से कतराने लगे जब ये माना जाने लगा कि इस बंगले में रहने की वजह से कइयों के करियर बर्बाद हुए और कुछ लोगों की असमय मौत हो भी हुई।

सिविल लाइंस को ब्रितानी शासकों ने अपने आला अफ़सरों के लिए बनाया था। यहाँ के पुराने बाशिंदे बताते हैं कि ये बंगला 1920 के दशक में तैयार हुआ था।

मुख्यमंत्र‌ियों ने भी इस बंगले में रहने से क‌िया इंकार

haunted bungalow delhi

आजादी के बाद इसे दिल्ली के मुख्यमंत्री निवास के लिए सबसे बेहतरीन माना गया। दिल्ली विधान सभा यहां से महज़ 100 गज़ दूर है।

सूबे के पहले मुख्यमंत्री चौधरी ब्रह्म प्रकाश ने 1952 में इसे अपना निवास बनाया। 1990 के दशक में दिल्ली के एक अन्य मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना भी यहीं रहे।

दोनों मुख्यमंत्रियों को कार्यकाल ख़त्म होने से पहले ही पद छोड़ना पड़ा। और फिर तो बंगले के साथ 'मनहूस' शब्द जुड़ गया।

पत्रकार सुजय महदूदिया 1980 और 1990 के दशक में अंग्रेज़ी दैनिक 'द हिन्दू' के लिए दिल्ली विधान सभा कवर करते थे।

महदूदिया कहते हैं, "खुराना की गद्दी जाने के बाद किसी ने इस बंगले को अपना घर नहीं बनाया। अफ़वाह फैल गई कि ये बंगला मनहूस है। मुख्यमंत्री बनने के बाद साहब सिंह वर्मा और शीला दीक्षित ने इसमें रहने से मना कर दिया।"

बंगले में मौत भी हुई है

haunted bungalow delhi

साल 2003 में दिल्ली की तत्कालीन सरकार में मंत्री दीपचंद बंधू ने सहयोगियों की सलाह को नज़रअंदाज़ करते हुए इसे अपना निवास बनाया।

महदूदिया कहते हैं, "उन्होंने कहा कि वो अंधविश्वासी नहीं हैं और बंगले में शिफ़्ट हो गए। लेकिन कुछ ही दिनों बाद वो बीमार पड़ गए। उन्हें मेनिनजाइटिस हो गया। जिससे उनकी अस्पताल में मौत हो गई।"

इसके बाद इस अफ़वाह ने और ज़ोर पकड़ लिया कि ये बंगला मनहूस है। इसके बाद अगले 10 सालों तक किसी नेता या अफ़सर ने इस बंगले को अपना घर नहीं बनाया।

साल 2013 में वरिष्ठ नौकरशाह शक्ति सिन्हा ने इसमें रहने का फ़ैसला किया। सिन्हा के अनुसार उनके लिए ये बंगला ख़ुशनुमा रहा लेकिन अन्य लोग ध्यान दिलाते हैं कि सिन्हा भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके थे।

इस साल 9 जून को इस बंगले को फिर से नया निवासी मिला। दिल्ली के वर्तमान मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इसे दिल्ली सरकार को नीतिगत सलाह देने वाले दिल्ली डॉयलॉग कमीशन का दफ़्तर बना दिया।

इन्होंने उठाया है इस बंगले में रहने का जोख‌िम

haunted bungalow delhi

कमीशन के वाइस-चेयरमैन आशीष खेतान इसके मनहूस होने की बात को बकवास बताते हैं। खेतान के अनुसार कमीशन के दफ़्तर के लिए इस बंगले को ख़ुद उन्होंने चुना है।

खेतान ने बीबीसी से कहा, "मुझे पता चला कि इतनी बड़ी सार्वजनिक संपत्ति को कोई नेता या अफ़सर इस्तेमाल नहीं कर रहा है क्योंकि उन्हें लगता है कि ये मनहूस है।"

उन्होंने कहा, "एक ऐसे वक़्त में जब हम डिजिटल इंडिया की बात कर रहे हैं, स्पेस में सैटेलाइट भेज रहे हैं, मुझे लगा इस मनहूसियत को तोड़ना ज़रूरी है।"

खेतान को इस बंगले को हासिल करने में कोई दिक्कत नहीं हुई क्योंकि इसे लेने वाला 'कोई नहीं' था।

खेतान के साथी देवेंद्र सिंह बताते हैं कि जब वो लोग यहाँ आए तो 'सारे कमरे टूटी हुई कुर्सियों और फ़र्नीचरों से भरे हुए थे।'

'भूतों को भी काम पर लगाएँगे'

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पिछले कुछ हफ़्तों में इस बंगले की साफ़-सफ़ाई हुई है। ताज़ा पेंट के गंध अभी तक इससे नहीं गई है। खिड़कियों पर नए पर्दे लग रहे हैं।

घुमावदार सीढ़ियों पर लगा सफ़ेद संगमरमर चमक रहा है। कॉन्फ्रेंस रूम में नए फ़र्नीचर लगाए गए हैं। बग़ीचे के फ़व्वारे की मरम्मत की जा रही है।

इस कमरे के सारे बेडरूम दफ़्तर के कमरों में बदल दिए गए हैं। जो क़रीब तीन दर्जन कर्मचारियों और नए इंटर्न्स की चहलक़दमी से गुलज़ार हैं।

खेतान कहते हैं, "हर किसी को अंधविश्वास से लड़ने की क़सम खानी चाहिए और वैज्ञानिक चेतना को बढ़ावा देना चाहिए। ये बहुत दुख की बात है कि पढ़े-लिखे लोग काले जादू और अंधविश्वास को बढ़ावा देते हैं।"

मैंने खेतान से पूछा कि इस बंगले में आने के बाद क्या उन्हें कोई भूतहा अनुभव हुआ?

उनका जवाब था, "नहीं, लेकिन हम कुछ भूतों को तलाश रहे हैं। अगर वो हमें मिल जाते हैं तो हम उनसे यहाँ काम कराएँगे। ज़ाहिर है, हमारे पास स्टाफ़ की कमी है।"

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