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दिल के बगीचे में तब प्रेम के फूल खिलने लगेंगे
गुरु मां आनंदमूर्ति
Updated Thu, 01 Jan 2015 11:10 AM IST
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अपनी इच्छित चीज मिल जाती है, तब अचानक थोड़ी देर के लिए हमारा मन ठहर जाता है, और हम आनंद में मग्न हो जाते हैं। मगर थोड़ी देर बाद वह चीज तो वहीं पड़ी रह जाती है; और हमारा मन सुख की तलाश में किसी और चीज की तरफ आकर्षित हो जाता है।
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यानी हमें सुख का अनुभव तब होता है, जब हमारा मन ठहर जाता है। मन ठहराने का तरीका हमारी श्वसनक्रिया में है। हमें अपनी श्वसनक्रिया शांत करनी चाहिए। श्वासों को शांत करने से उसी क्षण हमारा मन ठहर जाता है और हमें सुख की अनुभूति होती है। इसके लिए दुनिया के किसी भी व्यक्ति या वस्तु से पीछा छुड़ाने की हमें कोई जरूरत नहीं है; हमें सिर्फ अपने मन से मुक्त होने की जरूरत है। मन के मुक्त होते ही चैतन्यस्वरूप परमात्मा हमारे जीवन को प्रकाश से भर देता है।
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यहां प्रश्न यह उठता है कि अगर परमात्मा मेरे हृदय में विराजमान है, तो उसके लिए मैं क्यों प्यासा हूं। कबीर कहते हैं, जल विच मीन पियासी, मोहे देखत आवे हासी, अर्थात पानी में रहकर भी मछली पानी के बिना प्यासी है, यह देखकर मुझे हंसी आ रही है। हमारे मन का अधिष्ठान परमात्मा है। हम परमात्मा में ही रहते हैं, फिर भी हम परमात्मा से वंचित रहते हैं और दुखी होते हैं।
हमारा मन ज्यों ही ठहरता है, उसी क्षण उस प्यारे के प्रेम की बरसात हमारे दिल में होने लगती है। इसलिए अलग-अलग विधियों द्वारा श्वसनक्रिया को नियंत्रित करें और मन को शांत करें, ताकि हमारे दिल के बगीचे में परमात्मा के असीम प्रेम की बरसात हो।