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क्यों ब्रह्मा जी ने रखी देवता और दानव के समाने यह अजब सी शर्त
- ऋषि मार्कंडेय
Updated Wed, 20 May 2015 04:54 PM IST
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एक बार देवर्षि नारद ने अपने पिता ब्रह्मा से कहा, 'पूज्यवर आप परमपिता है। देवता और दानव आप की ही संतान हैं। भक्ति और ज्ञान में देवता श्रेष्ठ हैं, तो शक्ति और तप में दानव श्रेष्ठ हैं। इन दोनों में कौन अधिक श्रेष्ठ है। आपने देवों को स्वर्ग और दानवों को पाताल लोक में जगह दी, ऐसा क्यों?
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ब्रह्मा ने कहा कि इस प्रश्न का उत्तर देना कठिन है। देव और दानव दोनों मेरे ही पुत्र हैं। दोनों की तुलना अपने ही मुंह से करना उचित न होगा! लेकिन फिर भी समाधान का एक उपाय है। तुम आज ही देवों और दानवों, दोनों को निमंत्रण भेजो। वे भोजन पर आएंगे, तो तुम्हें उत्तर भी मिल जाएगा!
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नारद ने तत्काल ही असुरों और देवों को निमंत्रण दे दिया। दूसरे दिन देव और दानव, दोनों ब्रह्मलोक में भोजन के लिए पहुंचे। दानव पहले पहुंचे थे। उन्होंने खुद से शुरुआत करने के लिए कहा। भोजन परोसा गया। दानव भोजन शुरू करने ही वाले थे कि ब्रह्मा ने कहा, एक शर्त है कि असुरों का हाथ अब कोहनी से मुड़ नहीं पाएगा। इसी स्थिति में सभी को भोजन करना होगा।
असुरों ने खाना शुरू किया, पर ऐसी स्थिति में कोई कैसे खा सकता था! कोई सीधे थाली में मुंह डालकर खाने का प्रयास करने लगा, तो कोई भोजन हवा में उछाल कर मुंह में डालने की कोशिश करता। बात बन नहीं सकी और दानव बिना खाए ही उठ गए।
देवता पहुंचे। भोजन शुरू करने से पहले उन्हें भी शर्त बता दी गई। वे समझ गए कि अपने हाथ से भोजन करने पर रोक है। वे थोड़ा आगे खिसके और थाली से व्यंजन उठाकर पास बैठे दूसरे देवता को खिलाने लगे। इस तरह बिना हाथ मोड़े ही उन्होंने एक दूसरे को भोजन करा लिया। नारद यह सब देख संतुष्ट थे, जैसे उन्हें अपना उत्तर मिल गया हो।