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ऐसे लोग ही असल में भगवान की पूजा करते हैं
शिवकुमार गोयल
Updated Mon, 17 Feb 2014 11:05 AM IST
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रामचंद्र डोंगरे जी महाराज परम विरक्त और ब्रह्मनिष्ठ संत थे। उन्होंने अपने जीवन में सौ से अधिक कथाएं सुनाईं, पर दक्षिणा में एक पैसा भी स्वीकार नहीं किया। कथा के चढ़ावे के लिए आने वाला तमाम धन वह असहाय व अभावग्रस्त लोगों के भोजन की व्यवस्था और गरीब कन्याओं के विवाह के लिए भेंट कर देते थे।
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संत डोंगरे जी महाराज कहा करते थे, प्रभु ने हमें जन्म इसलिए दिया है कि हम उनके बनाए गए संसार को सुखी बनाने में जीवन लगाएं। यदि तुमको सुखी होना है, तो सबमें परमात्मा के दर्शन कर दूसरों को सुख और संतोष दो। दूसरों को सुख देना ही प्रभु की सच्ची पूजा है।
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एक बार उनसे किसी जिज्ञासु ने पूछा, अशांति क्यों बढ़ रही है? डोंगरे जी ने बताया, धनार्जन की अंधी दौड़ ने अशांति बढ़ाई है। संतोषी और सात्विक जीवन जीने की अपेक्षा जब से सांसारिक भोगों के प्रति लालसा बढ़ी है, तभी से धनार्जन की तृष्णा बलवती हुई है। यही अशांति का मूल कारण है।
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कुछ क्षण रुककर उन्होंने आगे कहा, कितने ही लोगों को मूर्ति में ईश्वर दिखाई देते हैं, पर उन्हें मानव में ईश्वर नहीं दिखाई देते। यदि मानव एक-दूसरे में भगवान के दर्शन कर दूसरों को सुखी करने का प्रयत्न करे, तो जगत की बहुत-सी समस्याएं स्वतः हल हो जाएंगी। प्यासे को पानी, भूखे को अन्न और रोगी को दवा देकर सेवा करने वाले लोग असल में प्रभु की ही पूजा करते हैं।