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ईसा ने कहा, मुझे उपहार में अपने पाप दे दो
शिवकुमार गोयल
Updated Wed, 25 Dec 2013 10:07 AM IST
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संत जेरोम जैसा उपदेश देते थे, वैसा ही आचरण भी करते थे। उनकी कथनी और करनी में कोई भेद नहीं था। वह सादगी, सरलता और सात्विकता की साक्षात मूर्ति थे। जेरोम प्रतिदिन अपने हाथों से किसी-न-किसी असहाय-अनाथ व्यक्ति की सेवा अवश्य करते। इतना करने के बावजूद वह हमेशा कहा करते थे, मैं संसार का सबसे बड़ा पापी हूं। जाने-अनजाने अनेक पाप मुझसे होते हैं। ईसा मसीह उनकी इस सरलता से बहुत प्रभावित थे।
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एक बार क्रिसमस की रात अचानक संत जेरोम की भेंट ईसा मसीह से हो गई। ईसा ने कहा, आज मेरा जन्मदिन है। क्या जन्मदिन का उपहार नहीं दोगे? संत जेरोम ने कहा, मेरे पास देने के लिए क्या है भला! मैं अपना हृदय आपको भेंट कर सकता हूं।
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ईसा ने कहा, मुझे आपका हृदय नहीं, कुछ और चाहिए। संत जेरोम ने जिज्ञासा व्यक्त की, वैसे तो मैं अपना पूरा शरीर आपको भेंट कर सकता हूं, पर मैं पापी हूं। यदि मेरे खजाने में पुण्य होते, तो मैं उन्हें आपको जन्मदिन के उपाहरस्वरूप जरूर भेंट कर देता।
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ईसा ने कहा, जब आपके खजाने में पाप-ही-पाप हैं, तो फिर उन्हें ही मुझे उपहार में दे दें। आप अपना कोई अवगुण मुझे दे दें। मैं आपके तमाम पापों का फल भोग लूंगा। ईसा की प्रेमभरी वाणी सुनकर संत जेरोम की आंखों से अश्रुधारा बह निकली। ईसा ने उन्हें प्यार से गले लगा लिया।